Tuesday, 5 February 2013


कभी भी न भूलने वाली वह भयावह काली रात 

           पच्चीस अगस्त २०१० रात के ठीक नौ बजे जगह रसौली गोरखपुर से लखनऊ आते समय बाराबंकी से थोड़ी दूर पहले ही यह जगह पड़ती है, पहले शायद कभी ध्यान भी नहीं दिया होगा आते-जाते समय कब ये जगह निकल जाती मालूम नहीं पर अब... !! अब तो जीवन पर्यन्त इस नाम को, इस जगह को कभी नहीं भूल सकते !!  
         हमारी नानी हमलोगों के साथ ही रहती थीं हमारी दादी के यहाँ, हमारा पूरा परिवार नानी को बहुत प्यार करता था हमारी अम्मा तो हमलोगों से ज्यादा ध्यान नानी का रखती थीं हर जगह अपने साथ ले जाती थीं घर के सभी बुजुर्ग लगभग खत्म हो चुके थे सिर्फ नानी रह गईं थीं इकलौती, बहुत बूढी हो चुकी थीं कुर्सी पर बैठे-बैठे दिनभर चाय मांगती रहती थीं “ ए बहिनी तनी चह्वा दे दे ” एक दिन उनके कप के गिरने की आवाज आई (स्टील के कप में ही वो चाय पीती थीं) सभी दौड़ कर उनके पास गये तो वो कुर्सी पर बैठे ही एक तरफ को झुक गईं डॉक्टर ने देखा तो ब्रेन हैम्रेज बताया लेफ्ट साइड पैरालाइज्ड हो चुका था हॉस्पिटल में ऐडमिट हो चुकी थीं | हमारे पास छोटी बहन का फोन आया कि हालत ठीक नहीं है तुम तुरंत आ जाओ हम उस समय लामार्टिनियर स्कूल के कार पार्किंग में अपनी कार में बैठे हुए थे प्रंकित का रिहर्सल चल रहा था पन्द्रह अगस्त के फंक्शन के लिये जैसे ही प्रंकित आये, हम रोते हुए कार ड्राइव करके अपने घर नाका-हिंडोला पहुंचे कार्तिकेय भी सी.एम्.एस से आ गये उस समय न कोई ट्रेन थी न बस, कार में ही कुछ कपड़े डाले कार्तिक को बैठाया मेरी मम्मी जी (सास) बाहर तक छोड़ने आईं कार्तिक के लिये कुछ खाने का सामान व कोल्ड ड्रिंक देने, हमारा ध्यान तो इस सब में था नहीं बस ये डर था कहीं देर न हो जाये मन ही मन भगवान से प्रार्थना कर रहे थे हे भगवान अनर्थ न होने देना हमें मिलवा ज़रूर देना | प्रंकित तो जा नहीं सकते थे वो अपनी दादी के पास ही रुक गये | खुद ही ड्राइव करके गोमती नगर तक पहुंचे ही थे कि छोटे बहनोई का फोन आ गया कि दीदी मनोज वहीँ मिल जाएगा उनका ड्राइवर, जो किसी काम से लखनऊ आया हुआ था खैर वो मिल गया रात होते-होते गोरखपुर पहुँच गये सीधा हॉस्पिटल पहुंचे नानी को देखकर जान में जान आई सभी लोग वहीँ थे अम्मा पिता जी भाई बहन भाभियाँ,बहनोई | नानी बेड पर थीं,अम्मा रोये जा रहीं थीं हमने नानी का हाथ पकड़ा भगवान को धन्यवाद कहा जो हमें मिला दिया उनका हाथ पकड़ कर चूम लिया और कहा “ए नानी देखो हम आ गईली आँख खोलो बाँयाँ हाथ तो उनका चल नहीं रहा था तो दाहिनी हाथ की अंगुली से अपने आँख का पलक ऊपर की तरफ उठा दीं और हमको और कार्तिकेय को देख लिया एक ही आँख से बिचारी देखे जा रही थीं और कुछ बोल नहीं सकती उनकी आँखों से अश्रु बह रहा था हम सब ने वह समय कैसे काटा शब्दों में व्यक्त करना आसान नहीं इस समय लिखते समय दिल चीत्कार कर रहा है डॉक्टरों का ये कहना था कि ये तो चमत्कार हो गया, ये जी कैसे गईं और पिता जी से कहा कि आप के पूरे परिवार के प्यार ने इन्हें बांध कर रखा है वर्ना कोई उम्मीद नहीं थी जबतक भी जी रहीं हैं ये इनका विल पॉवर है जा भी सकती हैं, कुछ दिन और रुक भी सकती हैं कुछ कहा नहीं जा सकता सबने खूब सेवा की हमसब बहने उनके कान में खूब मन्त्र बोले सब बारी-बारी से चालीसा व जाप करते रहे जब हालत थोड़ा सुधर गई तब पिता जी ने हमे कहा बेटी तुम जाओ प्रंकित को छोड़ कर आई हो और कार्तिकेय के स्कूल का भी नुक्सान हो रहा है हमसब हैं यहाँ तुमसे कुछ छिपा तो है नहीं जैसा भी होगा तुम्हे फोन से हाल-चाल देते रहेंगे हम वापस लखनऊ आ गये |
मन में डर तो बना ही था कि कभी भी कोई अप्रिय न्यूज़ आ सकती है ११ आगत को सुबह १० बजे वह अप्रिय खबर आ ही गई जिसके बारे में मालूम तो था पर शायद मन तैयार नहीं था पिता जी ने हमें मना कर दिया कि मिल तो चुकी न अब फिर बच्चों के साथ इस बारिश में आने से क्या फायदा उस दिन मेरी सास ने मुझे बहुत सहारा दिया बच्चे स्कूल थे वही चाय बना कर लाई दोपहर का खाना भी उन्होंने ही बनाया हमें तो सुध-बुध नहीं थी यहाँ पर सभी को मालूम था कि हमलोगों की नानी क्या थीं हमलोगों के लिये पूरे टाइम फोन पर भाई लोग सब विविरण देते रहे यहाँ तक कि घाट पर से पंडित के मंत्रोच्चारण की आवाज सुनाई देती रही और हम फूट-फूट कर रोते रहे अपनी अम्मा के लिये कि वो अब कैसे रहेंगी नानी के चले जाने से मेरी अम्मा कितनी अकेली हो गईं |
       दस बारह दिन बीतने के बाद भी नॉर्मल नहीं हो पा रहे थे | बहन ने बताया  कि २५ को हवन है उसमे तुम ज़रूर आना सभी रिश्तेदार पूछ रहे थे कि बेबी नहीं आईं, ये आखिरि काम है तुम आने की कोशिष करना हमने कहा ठीक है | उन्ही दिनों हमने भातखंडे में सितार से एम्.ए में एडमिशन लिया था रोज बारह से एक जाते थे क्लास अटेन्ड करने जब बच्चे स्कूल में होते थे | २४ को रक्षाबंधन की छुट्टी थी कार्तिकेय का टेस्ट चल रहा था पर जब डायरी देखा तो २५ को कोई टेस्ट नहीं था हमारे दूसरे नंबर वाले जीजा जी भी आये हुए थे उनके एक मित्र भी थे, संयोग बनता चला गया और हमलोग २४ को तडके कार से निकल लिये प्रंकित को भी ले लिया | जीजा जी के मित्र ही ड्राइव कर रहे थे बारिश बहुत हो रही थी एक जगह रास्ते में एक गाड़ी जो अचानक से रुक गई ये स्पीड संभाल नहीं पाए एकदम पास जाकर ब्रेक लगाईं जिससे कार भिड गई हम थोड़ा उनपर नाराज़ भी हुए कि डिस्टेंस ले कर चलाइए हमारी कार का पूरा बोनट आधा ऊपर उठ गया था हम अपनी कार जल्दी किसी को देते नहीं थे खुद ही धुलाई सफाई करते थे एक-एक स्क्रैच बचाते थे गाड़ी को चोट लगी हमें दर्द हुआ बहुत दुःख हुआ खैर अयोध्या में भी बहुत टाइम लग गया कांवर वाले सब तीर्थयात्री भरे थे जैसे-तैसे गोरखपुर पहुँच गये अम्मा के पास गये होनी को कोई टाल नहीं सकता बहुत समझाया कि अब हमसब तुम्हारे बच्चे हैं तुम्हारे साथ, हाँ नानी की कमी तो कोई भी पूरी नहीं कर पायेगा पर एक न एक दिन तो सबको जाना है देखो नानी इतनी महान आत्मा थी किसी को परेशान नहीं की हम आठ भाई-बहन, सबकी शादी बाल-बच्चे देख कर गई किसी भी कार्य में व्यवधान नहीं डाली आखिर तक रुकी रहीं बात-चीत तो चल ही रही थी पर हमें बीच में उठकर फिर कार लेकर बनने देने जाना पड़ा क्योंकि दूसरे ही दिन वापसी थी रक्षाबंधन की वजह से सभी वर्क्शॉप बन्द थे बड़ी मुश्किल से एक  मिली उसने कहा लेबर बुलवानी पड़ेगी पैसे ज्यादा लगेंगे हमने कहा ले लेना  कल गाड़ी हमें हर हाल में चाहिए ये काम भी हो गया दूसरे दिन यानि २५ को सभी जल्दी उठ कर पूजन की तैयारी में लग गये पंडित जी आ गये हवन शुरू हो गया वर्कशॉप से फोन आ गया मैडम गाड़ी रेडी है आकर ले जाइये वहाँ सब खुद ही इतने परेशान है भाई लोगों से कहा नहीं पिता जी को बताया और प्रंकित एवं जीजा जी के साथ निकलने लगे तो पंडित जी ने किसी को भेज कर हम तीनों के हाथ से हवन सामग्री अलग निकलवा कर रखवा लिया कार्तिकेय तो अपना हवन कर ही रहे थे, हम कार की वजह से इतना व्यस्त हो गये चूँकि दोपहर में ही निकलना था लखनऊ के लिये | कार ले आये जबतक हवन समाप्त हो चुका था अब सभी ब्राह्मण को भोजन कराया जा रहा था दान वाला कार्यक्रम भी हो चुका था | अंदर आये सारे रिश्ते दार ननिहाल के तरफ के ए बेबी इधर आओ हमारी शादी के बाद से किसी ने देखा ही नहीं था २१,२२ वर्ष बाद सभी देख रहे थे दोनों बच्चों को भी देखा सबने बुला कर बात किया आशीर्वाद दिया कहा तुम्हारे दोनों बच्चे राजकुमार हैं और दोनों बच्चे सफ़ेद कुर्ते पैजामे में थे सबसे मिलने मिलाने के बाद अम्मा के पास गये कहा अम्मा अब हमें निकलना है अम्मा को तो जैसे होश ही नहीं हमारा हाथ पकड़ ली चौंक गई अरे तुम भी अभी जा रही हो अभी कैसे जा सकती हो हमने कहा नहीं अम्मा कार्तिक का टेस्ट छूट जायेगा अगर आज नहीं गये तो, बहुत मुश्किल से निकल कर आये हैं दोनों बच्चों का स्कूल चल रहा है फिर आयेंगे तो लंबा रुकेंगे तुम्हारे साथ, अम्मा के अंदर इतनी शक्ति ही नहीं थी कि ज्यादा कुछ बोल पायें रो-रो कर बेहाल थीं हमने उन्हें गले से लगा लिया और उनको इतना असहाय टूटा हुआ देखकर सुबक पड़े कहा अपना ध्यान रखना अम्मा, पिता जी का चरण स्पर्श किया तबतक बहनों ने खाना पैक कर दिया था और ये भी कहा था कि जबतक सभी पंडित जी भोजन न करले तब तक कुछ न खाना हमलोग फोन से बता देंगे तुम्हे | वही जीजा जी किसी ड्राइवर को बुलवाए थे किराये पर आउटर्स तक अपनी बाइक से साथ-साथ छोड़ने आये और ड्राइवर को पैसे दिए और कहा ये हमारी बेटी है बहुत संभाल कर ले जाना स्पीड मत बढ़ाना दोनों भाइयों ने भी कहा था कि ६०,७० से ऊपर मत जाना और जीजा जी ने ये भी कहा हमसे बेबी तुम इसको पैसे मत देना हमने अचछा-खासा दे दिया है किराया भी दे दिया और नाश्ते पानी का भी दे दिया जीजा जी वाकई में हमें अपनी बड़ी बेटी मानते है कहा बेटा यहाँ काम नहीं होता तो मै लखनऊ तक तुमलोगों को पहुचने आता और इतने भावुक हो गये रो पड़े साथ में उनका बेटा भी था उद्देश्य, हमने उद्देश्य को बोला कि अब पापा को लेकर घर जाओ बहुत थक गये होंगे वो लोग भी जाते समय हाथ हिलाते रहे और हमलोग भी, शाम के चार बज रहे थे थोड़ी घबडाहट भी हो रही थी नया ड्राइवर है हमलोग अकेले है, भगवान भरोसे चल दिए | स्वतंत्र –चेतना के संपादक, आर.सी.गुप्त  हमारे जीजा जी लगते हैं उनका फोन आया तो आश्चर्य चकित हो गये कि इस बार तुम एक दिन भी नहीं रुकी और मिली भी नहीं जा रही हो वो अक्सर बहुत-अच्छे मन्त्र बताते रहते है उस दिन भी उन्होंने दुर्गाशप्तशती के कुछ मन्त्र बोले बहुत अच्छा लगता है उनको सुनना, बहुत ही मधुर वाणी है उनकी कह रहे थे जब नानी के बारे में सोच कर दुःख लगे तो इस मन्त्र को पढ़ना इसी तरह सबसे बातें करते हुवे आधा रास्ता पार हो गया घर से भी बराबर सभी लोग संपर्क बनाये हुए थे | ड्राइवर भी खूब अच्छे से बात करते हुए आराम से चल रहा था अपने गाँव की बात कर रहा था कि हमारी पत्नि पहले हमारे अम्मा बाबूजी को खाना खिलाती है तब अपने खाती है सुन कर डर खत्म हो रहा था कि परिवार वाला है थोड़ा संस्कारी भी है आधा दूर आ ही गये हैं कुछ घंटों की बात है बस, घर से फोन आ चुका था कि बच्चों को खाना खिला सकती हो अब, तो हमने उस ड्राइवर (उसका नाम बजरंगी था) से कहा कि अयोघ्या में रोक देना तो पहले चाय पियेंगे फिर खाना खायेंगे अयोघ्या निकलता जा रहा है वो कार रोक ही नहीं रहा है बच्चों ने जिद किया तो ना जाने कहीं ढाबे से बहुत दूर ले जाकर अँधेरे में कार रोका और कहा कि हम चाय भिजवा रहे हैं हमने कहा यहाँ कहाँ चाय मिलेगी यहाँ तो सब अँधेरा पड़ा है तुम तो कार इतनी आगे ले आये तो कहा नहीं हम भिजवा रहे हैं दस मिनट,पन्द्रह मिनट हमारी बहन व जीजा जी लगातार बात करते रहे कि वो जैसे ही आये उससे बात करवाओ करीब आधे घंटे में चाय लेकर एक छोटा सा लड़का आया हमने उससे पैसे पूछा तो उसने कहा मिल गया वापस गिलास लेकर चला गया थोड़ी देर बाद बजरंगी आया हमने पूछा इतनी देर क्यों लगा दी तो बोला खाना खाने लग गया था तो हमने कहा कार फिर वहीँ लगाते न यहाँ अँधेरे में इतनी दूर क्यों लगाये हमारे भी बच्चे भूखे हैं तुम भी इसी में से ले लेते इतना खाना है टाइम भी इतना लग गया फिर जीजा जी ने उसे फोन पर डाटा कि अब कहीं रुकना मत | वहाँ से जो इसने कार चालना शुरू किया कार की स्पीड बढ़ा दी सारा खाना गिरा पड़ा जा रहा है हम बार-बार कहे जा रहे है कि हमें कोई जल्दी नहीं है आराम से चलो तो कहने लगा आप घबड़ाइये नहीं हम आज से ड्राइवरी नहीं कर रहे है बहुतो की गाडियाँ चलाई हैं फिर कहने लगा आपके कार की हेडलाईट सही नहीं है ठीक से दिखाई नहीं दे रहा फिर हमलोगों ने रिलायंस पेट्रोल पम्प पे एक हज़ार की एक्स्ट्रा प्रीमियम पेट्रोल भरवाया जबसे कार ली २००६ से तबसे यही पेट्रोल लिया कभी सादा नहीं लिया | प्रंकित ने हमसे धीरे से कहा कि मम्मा हम आगे बैठने जा रहें हैं इसे कंट्रोल करेंगे इसने शायद ड्रिंक कर लिया है गाड़ी लहरा रही है हमारा तो मन हुआ कि उसे वहीँ छोड़ दे और हम और प्रंकित मिल कर ड्राइव कर लेंगे पर रात हो गई थी इसलिए रिस्क नहीं लिया हमें क्या पता था कि रिस्क उसे ले जाने में है | प्रंकित आगे बैठ गया उसकी ड्राइविंग से दहशत भी हो रही थी स्पीड कंट्रोल नहीं कर रहा और प्रंकित को तमाम बाते समझाने लगा ऐसे गेयर बदलते है प्रंकित बोला तुम चुप-चाप ड्राइव करो हमें आती है तुम ध्यान से चलो और स्पीड कम करो ऑल्टो कार और स्पीड १२० रात का समय हाइवे अभी बन रहा था जगह-जगह डाइवर्ज़ंन रात में ट्रके चलती हैं वो भी नशे में धुत होकर चलाते हैं चिंता बढती जा रही थी बजरंगी तो जैसे हवा से बातें करने लगा हम ड्राइविंग सीट के पीछे बैठे थे कार्तिकेय का सर हमारी गोद में था क्योंकि कार्तिक सो रहे थे प्रंकित आगे ड्राइवर के बगल में बैठे थे | जैसे-जैसे बजरंगी का नशा चढ़ता जा रहा था कार की स्पीड और बढती गई राईट को गया तो ट्रक आ रही थी चूँकि डाईवर्जन था इसलिए ट्रक भी इधर ही आ रही थी फिर लेफ्ट को ले लिया इतनी स्पीड में कार थी उसने क्या सोच कर लेफ्ट लिया मालूम नहीं शायद ट्रक से टक्कर को बचाने के लिये पर लेफ्ट साइड में अँधेरा था आगे क्या कुछ मालूम नहीं कार इतनी जोर किसी चीज़ से टकराई कार्तिकेय हमारी गोद से नीचे गिर गया और उसका सर ड्राइविंग सीट के नीचे चला गया उसे निकालने के लिये हम नीचे झुके मेरा राईट शोल्डर ड्राइविंग सीट से भिड गया पर कार्तिक का सर हाथ से निकाल कर उसे ऊपर किया और गाड़ी तो अभी टकराती जा रही थी आगे अभी देखा नहीं था क्या हो रहा है बस प्रंकित की आवाज़ सुनाई दी !ओह गौड ! जब आगे देखा तो प्रंकित का पूरा चेहरा खून से भरा हुआ,बजरंगी स्टेयरिंग पर औंधा पड़ा कान इकदम शून्य हो गये थे सायं-सायं कार की पूरी छत टूट कर आगे गिर गयी थी कार्तिक तो बेहोश था नाक से खून बहा जा रहा था प्रंकित बाहर निकला उसका सफ़ेद कुरता पूरा लाल खून आ कहाँ से रहा है मालूम नहीं जब कार्तिक को गोद उठाने के लिये राईट हैण्ड आगे बढाने की कोशिष की हाथ ही नहीं हिला लेफ्ट से उसे गोद में लिया कार का दरवाज़ा तो अपने आप खुल गया था लेफ्ट साइड का प्रंकित ज़ख़्मी होते हुवे भी हमें उतरने में मदद की पर बाहर निकल कर खड़े नहीं हो पाए धडाम से कार की सीट पर ही गिर गये गश व चक्कर आ गया फोन तो हाथ में ले लिया था लेटे-लेटे बाई हाथ के अंगूठे से डैडा यानि dada  टाइप किया सबसे आसानी से जो नम्बर मिल सके प्रंकित के डैडी का नम्बर अँधेरे में कुछ दिख तो रहा नहीं था पर भगवान की कृपा से नंबर लग गया पद्मेश जी ने फोन उठा लिया हम इतना ही बोल पाए घर से किसी को भेजिए एक्सीडेंट हो गया है इमरजेंसी है और आप तुरंत कोई फ्लाईट ले कर आ जाइए कार्तिक का कुछ समझ में नहीं आ रहा है इतना ही बोल पाए फिर आँख बन्द होने लगी प्रंकित ने हमें हिला कर आँख खोले रखने को कहा बोला मम्मा तुम किसी भी कीमत पर आँख मत बन्द करना खोले रहो..फिर सीट पर से उठाने की कोशिष करने लगा उसे डर था कि हम बेहोश न हो जाये हम उठ तो गये जैसे झूम रहे हों कार का सारा पेट्रोल भी गिर रहा था बस किसी तरह से कार से दूर होने का प्रयास करने लगे एवं हाइवे पर डर कि इतनी गाडियाँ आ रहीं है फिरसे टक्कर न मार दे तबतक काफी लोग इकत्रित हो चुके थे रसौली गाँव के आस-पास के थे सभी उन लोगों को देखकर फिर मन भयभीत हो गया थोड़ी बहुत ज्वेलरी भी पहन रखे थे उस समय क्या मनोदशा हो रही थी ब्रेन सिर्फ खराब सोच रहा था कुछ भी अच्छा नहीं एक माँ दो बच्चों के साथ बिल्कुल असहाय बीच सड़क पर रात में दुर्घटना ग्रस्त हो पड़ी है क्या करे क्या न करे बड़े बेटे का खून बहा जा रहा है छोटा बेटा जग नहीं रहा कोई मानसिक स्थिति का अंदाज़ा लगा सकता है भला .. , पर कहा गया है न कि अच्छा किया कहीं जाता नहीं है वहाँ जितने भी लोग इकत्रित हुवे थे सभी भले सज्जन थे वो लोग जल्दी-जल्दी हमलोगो को कार से अलग करने का प्रयास करने लगे कार्तिक को एक ने गोद में उठा लिया और आगे-आगे चलने लगा हमने उसे चीखकर रोका भी कि कहाँ मेरे बच्चे को लिये जा रहे हो उसने मेरी एक न सुनी हमें भी कुछ लोगों ने पकड़ कर जल्दी –जल्दी ले जाने लगे फोन भी उन्ही लोगों ने ले लिया अब सबके फोन भी आने लगे वही लोग रिसीव भी किये इतना ही सुन पाए कहते हुवे कि ड्राइवर नहीं बचा है और छोटे बच्चे की हालत सीरियस है हम इतना सुन कर जोर-जोर से रोने लगे हरे राम ये क्या हो गया प्रंकित को भी वही लोग पकड़ के चल रहे थे रोड क्रोस करा कर नीचे गाँव में ले गये एक डाक्टर के यहाँ वहाँ लाईट नहीं आ रही थी बहुत छोटा सा कमरा था जैसे गांव में होता है उस डाक्टर के पास कोई सामान नहीं था और उसने साफ़-साफ़ कह दिया हम कुछ नहीं कर पाएंगे सब जगह से धडाधड फोन आने शुरू हो गये गोरखपुर से भी हमारे फॅमिली डाक्टर ने उस गांव के डाक्टर से बात कर लिया फिर उसने प्रंकित के फेस से खून साफ़ किया कार्तिक को लिटा दिया गया था और हम हे भगवान हमारे बच्चों को बचा लो हम प्रंकित के डैडी को क्या मुह दिखायेंगे लगातार रोये जा रहे थे सब गांव की बूढी औरतें व बच्चे आ गये थे हाथ से पंखा कर रहीं थीं हमें चुप करा रहीं थीं चुप हो जा बिटिया धीरज रखो हम उन लोगों को ऐसी दयनीय दृष्टि से देख रहे थे कि जैसे सबकुछ उन्ही लोगों के हाथ में हो लखनऊ से हमारे देवर लोग चल चुके थे गोरखपुर से भी कार से भाई, बहन, बहनोई चल चुके थे फैजाबाद में हमारे मित्र राजीव ओझा जी भी पोस्टेड थे दैनिक जागरण में उन्हें भी घरवालों ने फोन कर दिया जल्दी से जल्दी जो भी पहुँच पाए एस पी सिटी, पुलिस इंस्पेक्टर मिडिया सभी वहाँ डाक्टर के यहाँ पहुँच गये हमलोगों को कार में लेकर बाराबंकी इमरजेंसी हॉस्पिटल ले गये कहा घबड़ाईये नहीं हम आपके गोरखपुर के डाक्टर के रिलेटिव भी है तो अपनी फॅमिली की तरह ही समझिए | हॉस्पिटल में जबतक इन्जेक्शन वगैरह दिया जा रहा था तबतक देवर लोग भी पहुँच गये और उनलोगों से कहा कि हमलोग लखनऊ तुरंत लेकर जा रहे हैं जबतक कार्तिक भी होश में आ गया था इन्जेक्शन से कौन सा दिया मालूम नहीं, प्रंकित का चेहरा अब भी साफ़ नहीं था खून आता जा रहा था मेरी चिंता भी बढती जा रही थी जितना केयर वो लोग कर पाए कर दिए थे इंजेक्शन से थोड़ी राहत मिली थी फिर देवर लोग अपनी गाड़ी में लेकर वहाँ हमारी कार के पास आये देखा वहाँ पूरी पुलिस फ़ोर्स लगी है कार तक जाना संभव नहीं था फिर एस पी सिटी से परमिशन लेकर कार का सारा सामन देवर ने घर की गाड़ी में लोड करवाया प्रंकित का ऐप्पल का लैपटॉप,आइपॉड पर्स सब सुरक्षित था ड्राइवर के बारे में पूछा तो वहाँ के लोगों ने बताया कि वो जिन्दा था बेहोश हो गया था पुलिस को देखकर किसी तरह भाग गया हमने मन ही मन भगवान को धन्यवाद किया कि ड्राइवर बच गया | हमलोगों को लखनऊ पहुँचने में ज्यादा वक्त नहीं लगा हॉस्पिटल ले जाये गये पता चला दाहिनी हाथ में फ्रैकचर है दाहिने पैर में दो तीन जगह से खून रिस रहा था प्रंकित का सर ठीक था चेहरा पूरा शीशों से छिल गया था नाक होंठ गर्दन मुह के अंदर तक महीन शीशे घुस गये थे एक साइड का पूरा आइब्रो गायब हो गया था उसके कपड़े उतरवा दिए गये कार्तिक का चेकअप हुआ उसे नाक के अंदर कहाँ चोट लगी है समझ नहीं आ रहा था अभी तो सबका जांच होना बाकी था | हमलोग घर लाये गये सभी लोग इकट्ठे हो गये सभी अपनों को देखकर फिर रो पड़े बाबू जी मम्मी जी (सास,ससुर )व घर के अन्य सदस्य सभी सांत्वना देने लगे कि चलो जान बच गई तुम सब सुरक्षित घर आ गये भगवान का लाखों शुक्र है बड़े चाचा ससुर जी कार्तिक के पास ही लेट गये उसे सदमें से बाहर लाने का प्रयास करने लगे कि किसी तरह ये कुछ भी बोले गुमसुम सा पड़ा था डरा व सहमा हुआ हमें छोड़ नहीं रहा था | थोड़ी देर बाद सभी चले गये कि अब तुम लोग आराम करो | हमें कहाँ आराम आने वाला हम तो बस प्रंकित के सिरहाने बैठ कर अपने आप को कोसने लगे कि क्यों हमने बच्चों के साथ इतना बड़ा रिस्क लिया मौत के मुह में डाल दिया सब मेरी गलती है हडबड तडबड गये और आये किसी की बात नहीं मानी मासूम से बच्चों के जीवन के साथ खिलवाड किया मेरा इतना सुन्दर राजकुमार जैसा बेटा पूरा चेहरा खराब हो गया सब मेरी वजह से बहुत धिक्कारा अपने आप को और बेटे के चेहरे पर से छोटे-छोटे शीशे अब भी निकल रहे थे उन्हें बीनकर टेबल पर रखते जा रहे थे बिना पलक झपके जैसे अब कुछ होने न देंगे अपने बच्चों को चाहे कुछ हो जाये तीन बजे बहन का फोन आया कि हमलोग तुम्हारी कार तक पहुँच गये हैं और सब देख रहे हैं कार देखकर तो लग ही नहीं रहा है कि इसमें कोई बचा होगा बेबी, साक्षात नानी ने तुम लोगों की जान बचाई है | उसने कहा अपनी ज्वेलरी सब चेक कर लो कुछ कार में रह तो नहीं गया ..हमने कान देखा तो एक बाली नहीं थी एक सेट फोन भी नहीं था ..उन लोगों ने बहुत ढूंडा नहीं मिला पर कार से स्पीकर, स्क्रीन जो अभी कुछ दिन पहले ही लगवाया था कार्तिक के लिये, कार के पेपर्स वगैरह निकाल कर ले आये लगभग पाँच साढ़े पाँच तक वो लोग घर आ गये घर आकर शब्बो ने बताया कि जब गांव वालों ने कार्तिक की हालत बताई तो अम्मा व हम सब, नानी के फोटो के सामने हाथ जोड़कर रोने लगे कि हे नानी बचा लो कार्तिक को ..... ! चलो अब तुम चिंता मत करो हमलोग आ गये है और अब तुम थोड़ी देर के लिये सो जाओ | कितने घंटों से आँख ने एक झपकी तक नहीं ली थी सो थोड़ी देर के लिये नींद भी आ ही गई | फोन की घंटियों से नींद खुल गई एकदम से उठना चाहे पर अपने आप को हिला भी नहीं पाए सारी रिब्स जैसे अकड़ गई हों हाथ और कंधा तो उठा ही नहीं मेरी चीख सुनकर और सब भी उठ गये सभी अख़बारों में न्यूज़ आ गई थी हर जगह से फोन आने शुरू हो गये लोग भी आने शुरू हो गये |हमारी हालत देखकर हमारे भाई बहन व बहनोई ने यह निर्णय लिया कि सभी को वापस गोरखपुर ले चला जाये वही अच्छे से देखरेख हो पायेगी वर्ना अकेले दोनों बच्चों के साथ ये क्या कर पाएंगी फिर उन्ही रास्तों से होकर गुजरना मन में इतना बुरा-बुरा ख्याल आ रहा था कि जैसे काल ने घेर रखा है फिर बुलावा भेजा है रही सही कसर पूरी निकालने के लिये..पर अपने हाथ में कुछ था नहीं और हमारा ब्रेन अभी कुछ भी सोचने समझने कि स्थिति में नहीं था बुरी तरह से सदमे में था सबलोग साथ थे धीरे-धीरे संभाल कर चला रहे थे कि कोई जर्क न पड़े प्रंकित के चेहरे को धूप से भी बचाना था कार्तिक तो गुमसुम था ही हम तीनों को कहाँ कहाँ चोटें आईं हैं ये भी नहीं पता था जब असहनीय दर्द होता तब मालूम पड़ता | शाम तक गोरखपुर पहुँच गये |
        इतना अच्छा लग रहा था इतने सुरक्षित महसूस कर रहे अब लग रहा था कि मेरी जिम्मेदारी खत्म ये लोग सब देखभाल कर लेंगे,  दूसरे दिन से सारी टेस्टिंग वगैरह शुरू हो गयी रिब्स में कई जगह चोटें आ गयी थीं राईट शोल्डर की बोन डिसलोकेट हो गयी थी एवं उसी बांह में फ्रैक्चर भी था धुन्सी हुई चोटें कई जगह आईं थीं प्रंकित को भी कई जगह चोटें आई थीं उसके चेहरे की पूरी सफाई हुई बहुत सारे शीशे अब भी चिपके हुवे थे कई घंटे तक निकाले गये धूप से बचना, पसीने से बचना बहुत सारी हिदायतें सबको अपनाते हुए हम लोग वहाँ डेढ़ दो महीने बिताए, वही कहावत मेरी छोटी बहन वंदना कहती रहती जब भी हम रोते ..कि “ ये दिन भी गुज़र जायेगा “ पिताजी से पूछते कि क्यों ऐसा हुआ पिता जी ..तो वो कहते कि देखो तुम इतना हडबडाई थी एक टेस्ट बचाने के चक्कर में सारे ही छूट गये कभी-कभी बड़ों की बात मान लेनी चाहिए चलो इसे भी भगवान का प्रसाद मान कर ग्रहण करो जो होना था वो तो हो गया आगे से घ्यान रखना बच्चों को लेकर थोड़ा सावधानी बरता करो अब उनकी जिम्मेदारी तुम्हारे ऊपर है भगवान ने बचा लिया कि कुछ नहीं हुआ जिस हिसाब से ये लोग गाड़ी की हालत बता रहे हैं सुनकर रोआं काँप जाता है अब सब चिंता छोड़कर आराम करो | हम तो रात में जब आँख बन्द करके सोने चलते तो कानों में वही गाड़ी की चरमराती हुई आवाज़ सुनाई पड़ती और पैर अपने आप नींद में ही उठ जाते ब्रेक लगाने के लिये, सदमा सोने नहीं देता....यह प्रक्रिया बहुत दिनों तक चलती रही | वहाँ सभी ने बहुत सेवा की खूब अच्छी देखभाल की | थोड़ा ठीक होने पर वापस भाई के साथ लखनऊ आ गये दिल बेहद कमज़ोर हो चुका था बहुत कुछ छूट चुका था भात्खंडे भी एवं दूरदर्शन भी हमारी प्रिय कार हमसे बिछड चुकी थी पर इतना सब होने के बाद भी हम अपने बच्चों के साथ थे उनके पास थे और आगे से बच्चों के साथ कभी भी कोई भी रिस्क न लेने का प्रण कर चुके थे एवं अपने से बड़ों का कहना ज़रूर मानेंगे | वो दिन था और आज का दिन अब वापस उसी हाथ से सितार भी बजाने लगे और फिरसे ड्राइव करने लगे हैं भगवान का एवं हमारे सभी शुभचिंतकों का लाख लाख शुक्र है हम सब सही सलामत हैं | दोस्तों आप सभी को चाहे कितना भी ज़रूरी क्यों ना हो कभी भी ओवर स्पीड मत करियेगा और हो सके तो अपनी कार खुद ही चलाइए अपने पर भरोसा ज्यादा भला होता है मेरा बेटा आखिर तक कहता रहा मम्मा हमदोनो मिलकर आधे-आधे रस्ते चला लेंगे किराये का ड्राइवर न लो पर हमने उसकी बात बच्चा समझ कर नहीं मानी जिसका नतीजा भुगत चुके | अच्छी बुरी सभी यादों को सहेजने की हमारी प्रक्रिया आप सभी को कैसी लगती है अपनी राय अवश्य दीजियेगा | हम रहें न रहे हमारी बातें ज़रूर रह जाएँगी जो गलतियाँ 
हमने की इसे पढ़ने के बाद कम से कम कोई और दुहरायेगा तो नहीं !!         
       
               शुभकामनाओं के साथ आप सभी की अपनी 
                                       प्रीति         

                      यहाँ कुछ फोटोग्राफ़्स हैं ..
       इस तस्वीर में, नानी को देखने सफ़र से सीधा हॉस्पिटल पहुंचे ... 



 
                       स्वर्गीय 'प्रिय नानी'                                          

Tuesday, 31 January 2012

संस्मरण,लन्दन का वह पहला दिन.....


 हमारा पहला सफ़र हिन्दुस्तान से बाहर जाने का, इंग्लैंड में बसे एक छोटे से शहर लन्दन का...........
                                                                                                                                                        विवाहोपरान्त अपने पति महोदय के साथ सात समन्दर पार... जाना, जहाँ उनका निवास-स्थल था वेस्ट-केंसिंग्टन में जो कि सेन्ट्रल लन्दन में था | सन १९९१ की जनवरी..... पहली बार हवाई जहाज में बैठना,इतनी ऊँचाई पर उड़ना जिसकी कभी कल्पना नहीं की थी सपने में भी नहीं सोचा था....सिर्फ नौ घंटे में लन्दन वो भी दिल्ली  से सीधा इंदिरागांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट से लन्दन के हीथ्रो एयरपोर्ट पर ... | सब कुछ विधिवत हो रहा था सामान आ गया ब्लैक कैब यानि कि बड़ी टैक्सी सारा सामान टैक्सी ड्राइवर ने सेट कर दिया हमदोनो बैठ गये और टैक्सी चल पड़ी .....बादलों से घिरा हुआ आकाश, हल्की-हल्की रिमझिम फुहार....ठंडी-ठंडी हवाएं....बस मन हो रहा था टैक्सी की खिडकी खोले ही रहूँ और चेहरे से ठंडी हवाएं बूँदों के साथ टकराती रहें..... | हमने पूछा अपने पतिदेव से कि आज बदली है क्या यहाँ पतिदेव ने कहा नहीं आज ही नहीं यहाँ हमेशा ऐसा ही रहता है बहुत ठंडा मौसम रहता है | मुझे तो कुछ खास मालूम नहीं था लन्दन के बारे में जौग्रफी थोड़ी कमज़ोर रही है मेरी, ब्रिटेन,इंग्लैण्ड,यूनाइटेड किंगडम,योरप,लन्दन सब एक ही समझते थे रहते-रहते मालूम हुआ क्या, क्या है...| जब टैक्सी सड़क पर दौड़ रही थी,जैसे लग रहा था कि ग्रे कलर की कारपेट पर ब्लैक कलर की ट्वाय कार चल रही है कहीं कोई घड़घड़ाहट या आवाज नहीं कितनी गाडियाँ चल रही थीं सड़क पर लेकिन कहीं कोई आवाज़ नहीं बस भागती जा रहीं थीं सरपट किसी को किसी से कोई मतलब ही नहीं कहीं कोई ट्रैफिक पुलिस भी नहीं,सभी ट्रैफिक सिग्नल को फौलो करते हुए चले जा रहे थे जगह-जगह स्पीड लिमिट का साइन बना हुआ था सभी उसी हिसाब से स्पीड में गाडियाँ चला रहे थे एयरपोर्ट से फ़्लैट तक जाने में काफी टाइम लग गया | पतिदेव ने कहा कि यहाँ ज़्यादातर लोगों का टाइम गाड़ियों में ही बीतता है, एक जगह से दूसरी जगह तक पहुँचने में डिस्टेंस काफी होता है कोई शोर्टकट भी नही होता है इंडिया की तरह कि अंदर ही अंदर गली गली निकल लो | यहाँ पर कोई रूल्स ब्रेक नहीं करता, ओवर स्पीड नहीं करता, ट्रैफिक सिग्नल में ही कैमरे लगें होते हैं, जिसने भी रूल तोड़ा तुरंत उसकी फोटो खिंच जायेगी और पुलिस तुरंत पकड़ती है फिर जुर्माना बहुत लंबा भरना पड़ता है | 
                फ़्लैट आ चुका था हम लोग कैब से उतरे टैक्सी ड्राईवर ने सामान सब निकाल दिया उसका जितना भी किराया हुआ था, दे दिया गया, वह चला गया | फ़्लैट के बाहर का मेन डोर जिससे और लोग भी अंदर जाते हैं, कईं फ़्लैट थे उसमें, ऊपर और बेसमेंट में, हम लोगों का ग्राउंड फ्लोर पर था | मेन डोर पर ही इलेक्ट्रौनिक बटन लगे थे, जिसके फ़्लैट में जाना हो, वो नंबर दबा दो, अंदर यदि कोई है तो वह फोन उठा कर पूछता है, कौन है, जो भी होता है बता देता है, तो वह अंदर से ही स्विच दबाता है, बाहर वाला डोर खुल जाता है, फिर ऑटोमेटिक्ली लॉक हो जाता है चूँकि मेरे पति जी का फ़्लैट तो खाली था तो बेल बजाने का कोई मतलब नहीं इसीलिए चाभी से बाहर का दरवाजा खोला दाहिनी तरफ रैक पर पतिदेव के नाम की खूब सारी पोस्ट रखी थी आगे चलकर बायीं हाथ पर फ़्लैट का दरवाज़ा था एवं सीधे एक जीना गया था जो कि ऊपर के फ्लैट्स के लिये था,सब पूरा कार्पेटेड था एक पल को मन में आया कि चप्पलें उतार कर चलें क्या,फिर देखा पति महोदय जूते पहने हुए ही फ़्लैट का दरवाज़ा खोल रहे हैं,दरवाज़े के बाहर खूब सारे नये काले पौलिथिन बैग पड़े थे नीचे कारपेट पर,हमने पूछा ये क्या है तो उन्होंने कहा,कूड़ा फेंकने के लिये...बड़ा आश्चर्य हुआ...खैर अंदर घुसे सामने ही छोटा सा टॉयलेट जिसमे बाथटब था, कमोड व वाशबेसिन सब सफ़ेद रंग का चमचमाता हुआ,उस बाथरूम में भी कारपेट लगा था ग्रे कलर का हमने पूछा यहाँ कैसे कोई नहायेगा उन्होंने कहा टब में शॉवर लिया जाता है कर्टन लगाकर ...| उसके बगल में बायीं हाथ पर गलियारे नुमा ओपन किचेन था वहाँ कारपेट नहीं वुडेन फ्लोर थी | सबकुछ उसमे फिक्स था छोटा सा डिशवॉशर,माइक्रोवेव,फ्रिज कुकिंगरेंज चिमनी के साथ लगा था,कई कबर्ड्स थे छोटे-छोटे,एक छोटा सा बेंत का बना रैक टंगा था जिसमे छोटी-छोटी शीशियाँ मसालों की लगी थीं किचेन के बाद  ड्राइंग रूम में ग्रे सोफा,ग्रे पर्दा,डाइनिंग टेबल,सेन्ट्रल टेबल व एक चेस्टड्रोर थी जिसमे छोटा सा बार भी बना था कुछ बुक्स रखे थे एवं सिल्वर के शो पीसेज सजे थे सब कागज़ी वॉल थी जिस पर दो वुडेन फ्रेम एक माँ सरस्वती की व एक श्री गणेश भगवान की थी | वापस पैसेज में घूम कर दूसरी तरफ मास्टर बेडरूम था जिसमे कैबिनेट के साथ ही ड्रेसिंग टेबल भी लगा था डबल बेड भी दोनों साइड से छोटी-छोटी कैबिनेट्स के साथ फिक्स थी सफ़ेद रंग का सारा सेट था | बगल में एक सिंगल रूम था जिसे पति महोदय ने कंप्यूटर टेबल, चेयर वगैरह लगाकर ऑफिस बना रखा था पैसेज में ही वाशिंग मशीन की जगह दी हुई थी जिसमे मशीन फिक्स थी | फ़्लैट गन्दा बिल्कुल नहीं था बस बेडरूम में इनके कपड़े थोड़े बहुत फैले थे कुछ बेड पर पड़े थे ग्रे कलर की चादर बिछी थी | सब दिखने के बाद पति जी ने कहा मेरे इस छोटे से फ़्लैट में तुम्हारा स्वागत है ...कोई होता तो आरती उतारता पर तुम्हे आते ही मेरे साथ सब सफाई करवानी पड़ेगी | एक डेढ़ महीने से बन्द पड़ा था पति जी शादी के लिये इंडिया जो आ गये थे |
                         अच्छा लगा सब कुछ क्यूट सा, सारी फैसिलिटी थी इतनी छोटी सी जगह में दुनिया का सारा सुख | खिड़कियों के नाम पर खूब बड़े-बड़े शीशे लगे थे बिना किसी जंगले व जाली के पर्दा हटाओ तो पूरा नज़ारा देखो बाहर का | सबसे पहले तो चाय चहिये थी मुझे सो बनाई पति जी के लिये कॉफी बनाई दोनों ने बैठकर पिया फिर सब सामान सेट किया गया | शादी के बाद अभी तक तो इंडिया में कुछ बनाया नहीं था पहली बार लन्दन में ही बनाया कॉफी तो पसंद आ गई थी पतिदेव को ...फिर वो सब्जी व थोड़ा राशन लेने चले गये पास ही में एक ग्रोसरी शॉप थी किसी इंडियन की वह सब हिन्दुस्तानी मसाले,राशन वगैरह रखते थे | सामान लेकर आये पति जी व बोले कि चावल,दाल व आलू टमाटर का लुटपुटा खायेंगे दाल गाढ़ी व खूब जीरे से छौंकी हुई | बनाने में थोड़ा संकोच हो रहा था कि न जाने कैसा बने मिर्च,नमक कम ज्यादा न हो जाये पतिदेव जी तो लहसुन प्याज भी नहीं खाते,चाय भी नहीं पीते ...| खाना जबतक बन रहा था वो अपना सारा पोस्ट चेक करने लगे ज्यादातर शादी की बधाइयाँ थीं साथ ही टेलीफोन पर ऑन्सरिंग मशीन में मैसेज भी सुनते जा रहे थे सभी शुभकामनाएँ एवं कब लौटोगे यही बोल रहे थे दो तीन मैसेज तो इंडिया के ही थे बाबूजी के व देवर जी के कि पहुँचते ही खबर करो बहू ठीक है न |
                               खाना बन गया पूरे फ़्लैट में दाल छौंकने की महक भर गई | हमदोनो ने साथ खाना खाया पतिदेव तो तारीफें करते नहीं थक रहे थे कि कितना टेस्टी खाना बनाई हो ...लग रहा है सालों बाद अच्छा इंडियन खाना खाया हूँ खूब ओवरईटिंग हो गई...हमें भी बहुत अच्छा लग रहा था अपने हाथ का खाना खुशी भी हो रही थी कि बना लिया ठीक-ठाक | खाने के बाद पति जी ने कहा कि अभी लन्दन में किसी को नहीं बताएँगे कि हमलोग आ गये हैं इंडिया फोन करके बता दे रहे हैं फिर ऑन्सरिंग मशीन लगाकर हमलोग सो जाएंगे थकान लग रही है हैवी खाना खाने के बाद नींद तो आनी ही है ...खैर हमलोग जो दोपहर को सोये ...तो दूसरे दिन दोपहर में ही उठे जेट लैग लेकर ...............!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!                                 

Sunday, 11 December 2011

श्रद्धांजलि

Late Dr Lakshmi Mal Singhvi 
क्यों चले जाते हैं अक्सर वो लोग,इस जहाँ को छोड़कर
जहाँ जिसे छोडना नहीं चाहती,खोना नहीं चाहती 

नम करती आँखें और बहुत कुछ कहती ये बातें........ ...... ...


लन्दन में भारत के उच्चायुक्त महामहिम 
स्वर्गीय डा. लक्ष्मी मल्ल सिंघवी का दौर~~
                                              एक ऐसा दौर जो कभी विस्मृत नहीं हो सकता, भुलाये नही भूलता एक ऐसी हस्ती, ऐसी विभूति जो सबके लिये सम्माननीय रही, पूज्यनीय रही |सहज, सरल, उदार, साधारण सा व्यक्तित्व,प्रतिभाओं के धनी ओजस विचार वाले,स्वभाव में आत्मीयता ऐसे धीर पुरुष जो 'युग-पुरुष' कहलाएं बिरले ही होते हैं | 'महामहिम' उनकी ऊँची पदवी से नहीं वरन उनकी महानता के कारण कहलाते थे वह..., आज हम सब के बीच नहीं रहे | वह अपने-आप में ही एक ऐसी संस्था थे, एक ऐसा मार्गदर्शक थे जो 'स्व' में सीमित नहीं रहे बल्कि लन्दन में बसे सभी भारतवासियों के ह्रदय में बसे थे,समाहित थे, उनकी कमी शायद ही कोई भर पाए | जो-जो कार्य लन्दन में उन्होंने किये चाहे सामाजिक कार्यक्रम हो, धार्मिक हो, राष्ट्रीय हो या फिर पारिवारिक हो हर कार्यक्रम में वह सक्रिय होकर उपस्थित होते थे, अस्वस्थ होते हुए भी पधारते जरुर थे और सबसे अच्छी बात यह थी उनकी कि वो हमेशा आदरणीया कमला आंटी (उनकी धर्मपत्नी) के साथ ही सभी कार्यक्रमों में आते थे एवं समय के पाबंद थे ठीक समय पर आते थे | आप दोनों के बारे में कुछ भी कहना सूरज को दीपक दिखाने वाली बात होगी पर दिल कहे बिना,लिखे बिना मानता ही नहीं | श्री सिंघवी जी के पी. ए., हिन्दी ऑफिसर के पद पर नियुक्त,  स्वर्गीय डा.सुरेन्द्र अरोड़ा वह भी बहुत सम्माननीय कहलायेंगे जो अब वह भी हम सब के बीच नहीं रहे...| डा.सिंघवी व कमला आंटी की बात बिना अरोड़ा अंकल के पूरी नहीं होती अधूरी सी लगती है | एक ऐसा सच्चा सेवक, मालिक भक्त, उतने ही उदार, सज्जन सहृदय जो आज के समय  में मिलना असंभव सी बात लगती है | कोई याद करे न करे पर इनलोगों की छाप ह्रदय पर ऐसी पड़ी है जो सदैव अमिट रहेगी वो भी लन्दन जैसे शहर में जहाँ अपने अपनों को भुला देते हैं जहाँ अपने देश 'भारतवर्ष' की माटी की सुगंध भी कुछ सफल व बुलंदियों को छूने वाली हस्तियों को पसंद नहीं आती, वहाँ उन तमाम सफलताओं को हासिल करने के पश्चात एवं आकाश की ऊँचाइयों को छूने के पश्चात भी एक सहज,सरल,साधारण एवं आत्मीय बने रहना, जन-जन के ह्रदय में बसे रहना बहुत बड़ी बात है,सबसे बड़ी उपलब्धि है | इन बड़ी बातों के लिये श्री सिंघवी जैसी शख्सियत ने छोटे-छोटे लोगों की छोटी-छोटी बातों का भी ध्यान रखा | वह भीड़ में आते तो थे पर उन्होंने भीड़ को कभी भी भीड़ समझकर नहीं देखा वो भीड़ उनका परिवार बन जाती थी हर एक की उपस्थिति उनके लिये मायने रखती थी  भीड़ में वह बहुत बड़े आदमी बन कर कभी नहीं आये उनकी सादगी, उनका प्रेम भरा ह्रदय हर नज़र से मिलता था | जबतक लन्दन में उनका दौर रहा वह कार्यक्रमों के अधीष्ठाता होते थे, संरक्षक होते हुए भी आयोजक बन जाते, व्यवस्थापक बन जाते और आतिथ्य सत्कार में जुट जाते |
                                                   उन लोगों ने हमें व हमारे पति श्री पद्मेश गुप्त जी को बहुत प्यार व दुलार दिया | हमे याद है जब हमारे बड़े सुपुत्र चिरंजीव प्रंकित जी का जन्म १९९३ में लन्दन में हुआ तो हमने उन्हें  भी आमंत्रित किया था श्री सिंघवी जी ने उस आमंत्रण पत्र पर प्रिय प्रंकित के नाम के साथ हमारा व पद्मेश जी का नाम जोड़कर बड़ी सुन्दर सी दो पंक्तियाँ लिखकर हमारे पास भिजवाई थी....  
Dr. Preeti Gupta, Prankit Gupta, Mrs. Kamla Singhvi
and Late Shri Kanhayan Lal Nadan
      !!  प्रंकित अंकित प्रीत धरा पर    
       मुकुलित पद्म वसुंधरा पर .  !!   
                                                                                                                        ये थी उनकी सहजता जो बड़ी आसानी से एक आम आदमी के ह्रदय में जगह बना ले | जब भी उनके निवास-स्थल पर   'काव्य-गोष्ठी', श्रीकृष्ण- जन्माष्टमी या कोई अन्य कार्यक्रम होता उसमे वह जगह के हिसाब से उतने ही लोगों को आमंत्रित करते जितने आराम से बैठ सकें | हर व्यवस्था हर सुविधा का ख्याल रखा जाता और भोजन बिल्कुल शुद्ध शाकाहारी बिना लहसुन व प्याज के होता था हमारे पतिदेव लहसुन व प्याज नहीं खाते कमला आंटी इस बात का बराबर ध्यान रखती | अतिथियों का ऐसा आतिथ्य सत्कार करतीं जो लाजवाब था | एक कुशल गृहणी, कुशल पत्नि और कुशल माता होने के साथ-साथ सबसे बड़ी बात एक भारतीय नारी, जो भारत की सभ्यता का प्रतीक थीं वहाँ पर | हर अतिथि की प्लेट में सभी कुछ खाने की सामग्री खुद ही देती थीं कोई रह तो नहीं गया,कोई छूट तो नहीं गया सब खुद ही संभालती थीं | वहाँ इतने सारे नौकर-चाकर होने के बावजूद भी वो खुद ही सभी की देख-रेख करती थीं | जहाँ डा.सिंघवी एक उच्चायुक्त होते हुए भी एक बहुत ही उच्चकोटि के कवि थे वहीँ कमला आंटी भी एक उच्चकोटि की कवयित्री हैं उनकी यह कविता  ''राम मैं तुम्हे कभी माफ नहीं करूंगी'' बहुत चर्चित रही एवं उनकी प्रिय कविता है | डा.सिंघवी जी की एक रचना बोधगीत जो उन्होंने हमें गाने के लिये कहा था "हिन्दी-सम्मलेन'' के दौरान 'भारतीय विद्या भवन' में एवं 'नेहरु सेंटर' में  हमने गाया था उसकी दो लाइनें हैं....
         !! कोटि-कोटि कण्ठों की भाषा,जनगण की मुखरित अभिलाषा 
         हिन्दी है पहचान हमारी,हिन्दी हम सब की परिभाषा    !!       
Dilip Kumar, Late Shri Lakshmi Mal Singhvi, Shri Keshri Nath Tripathi,
Dr Dau Ji Gupta,  Ajitabh Bachchan, Ramola Bachchan and Dr. Preeti Gupta



Late Dr. Lakshmi Mal Singhvi with Sagar ji Maharaj
and Late Dr Surendra Arora

Dr. Padmesh Gupta reciting poetry at
Dr. Singhvi's place
              ये सब स्मृतियाँ हैं जो कभी विस्मृत नहीं हो सकतीं हमेशा-हमेशा के लिये अंकित हो गईं हैं | एक छोटी सी घटना, एक ऐसी अनुभूति जो उनकी आखिरी निशानी बन गई मेरे पास | करीब १२ वर्ष पहले हम भारत आ गये एवं उससे एक दो वर्ष पूर्व वह भी परिवार सहित दिल्ली आ गये थे | २००६ में मेरा पहला काव्य संग्रह ''भावनाओं के रंग'' प्रकाशित हुआ और हमने अपनी एक पुस्तक उन्हें दिल्ली भेज दिया दूसरे दिन ही सायंकाल      डा.सिंघवी अंकल व कमला आंटी का मेरे मोबाइल पर फोन आया बधाई देने के लिये बहुत खुशी हुई इतने सालों बाद हमने उन दोनों लोगों की आवाज़ सुनी दिल भर आया वो बोले कि बेटा हम अस्वस्थ चल रहे हैं वर्ना तुम्हारे किताब के लोकार्पण पर जरूर आते उन दिनों हम गोरखपुर में थे अपनी पी.एच.डी. कम्प्लीट कर रहे थे उहोने हाल-चाल पूछा छोटे सुपुत्र का नाम पूछा ढेरों आशीर्वाद दिया फोन पर ही हमने समीक्षा के लिये कहा उहोने कहा अभी तो पुस्तक हाथ में है तुरंत मिली है पूरी पढकर फिर लिखेंगे इतने दिनों बाद बातचीत करके बहुत अच्छा लगा | १० दिन बाद जब  हम लखनऊ आ गये पता चला की उनका एक पत्र आया है जिसमे उन्होंने पुस्तक की चर्चा की है एवं अपनी अस्वस्थता के बारे में लिखा है कुछ दिनों पश्चात एक और पत्र आया उनके लेटर-हेड पर जिसमे उन्होंने बहुत ही भावुकता से मेरे पुस्तक की समीक्षा लिखी है बहुत ही मार्मिक ढंग से, ह्रदय से पढ़ी है मेरी पुस्तक ....| हम उनको  धन्यवाद कहने के लिये सोच ही रहे थे और हिन्दुस्तान में  लखनऊ में होते हुए भी हमको उनकी दुखद घटना का पता नहीं चल पाया वो तो मेरे पुत्र प्रंकित ने लन्दन से ढाई बजे रात में फोन पर बताया कि मम्मा तुम्हे पता है सिंधवी अंकल की डेथ हो गई है हमने कहा अरे नहीं बेटा तुम किसी और को समझ रहे होगे अभी तो हमारी बात हुई थी उनसे...बड़ा ही रिलैक्स होकर कहा हमने ..पर फिर बेटे ने कहा नहीं मम्मा डैडी बहुत दुखी हैं !!!!!! बस इतना सुनना और आधी रात को मेरे मुह से चीख निकल गई हाय राम...और आँसुओं की धारा बह पड़ी...दिल रो पड़ा...एक ऐसे सच्चे इंसान के लिये,एक इतना बड़ा नुक्सान,एक इतनी बड़ी अनुपस्थिति जो कभी भी कोई भी पूरी नहीं कर सकता  उनकी सच्चाई एवं सादगी का, आत्मीयता का, एक अपने होने का एहसास जो न जाने कहाँ से हमलोगों को सफ़र में मिल गये और इतने अपने हो गये इतने प्रिय हो गये जैसे अपने पिता | बस अफ़सोस ये है कि उन्हें धन्यवाद के जगह श्रद्धांजलि देनी पड़ रही है | उनकी याद उनका व्यक्तित्व, उनका काम करने का तरीका ये सब अब उनकी सिर्फ मधुर स्मृतियाँ  हैं जिनका मेरे जीवन पर बहुत गहरा प्रभाब है और रहेगा, उन जैसा कुछ भी  यदि भविष्य में कर पाऊं तो मेरा जीवन एक सार्थक जीवन बन पायेगा | इस घटना ने मुझे झकझोर के रख दिया और मन के उदगार व्यक्त हो गये ~~~~~
                         '' कोटि-कोटि कण्ठों की भाषा ''
                              कोटि-कोटि कण्ठों की याद बन गई 
                                   एक अमिट इतिहास बन गई ........शत-शत नमन आपको ...
                                                                                         '' भावभीनी श्रद्धांजलि ''
                                                                                                                                          डा.प्रीति गुप्ता
                                                                                                                                                 लखनऊ                          
                                                             


Monday, 7 November 2011

!! तलाक !! एक गुज़ारिश...एक अपील....

''तलाक या डिवोर्स" यह शब्द आया कहाँ से ? हमारी संस्कृति या सभ्यता ने कभी ये नहीं बताया, या स्कूलों एवं कॉलेजों में न कभी पढ़ाया गया |पौराणिक ग्रंथों में भी चाहे वो धार्मिक हों,ऐतिहासिक हों कहीं भी इन शब्दों का  जिक्र नहीं है, हाँ सतीप्रथा-बालविवाह का प्रचलन पूर्वजों में था पर 'तलाकप्रथा' तो कभी भी नहीं था जहाँ तक हमें ज्ञात है फिर इस प्रथा को हमारे समाज में बाहरी तत्वों ने लाकर विकसित कर दिया या खुद हमारा समाज आधुनिक फैशन की दौड़ में लग गया और खुद ब खुद अपना लिया ? समाज की बात तो दूर, यहीं तक नहीं इसने तो भारतीय कानून में भी अपना हक जमा लिया एवं कानून भी इस प्रथा को बढ़-चढ़ कर सहायता करने लग गया | आखिर क्यों ? ऐसी कौन सी मजबूरी आ गई अपने देश में, समाज में या परिवार में ? क्यूँ बढ़ाया जा रहा है इसे ? इससे सिर्फ व्यक्तिगत फायदा या नुक्सान, दोनों ही हो सकता है | फायदा दोनों पार्टियों का कत्तई नहीं हो सकता सिर्फ एक पार्टी फायदे में रहेगी और दूसरी पार्टी नुक्सान सहेगी | बात फायदे या नुक्सान की भी नहीं, बात यह हमारी संस्कृति की है | हम सब भारतीय अपनी संस्कृति व सभ्यता की वजह से ही दूसरे देशों में आदर व प्रतिष्ठा पाते हैं न कि बाहरी फैशन के दिखावे की वजह से | यदि इस प्रथा पर पाबन्दी नहीं लगाई जायेगी तो फिर समाज के लिये कोई जगह ही नहीं बचेगी | एक सभ्य समाज में सिर्फ सभ्य लोगों के ही रहने की इजाजत होती है फिर जब सभी तलाकशुदा होते जाएंगे तो वे सभ्य कहाँ से रहे फिर समाज में उठने-बैठने लायक कहाँ से रहेंगे ? हमारी सरकार से और इस क़ानून को मान्यता देने वालों से विनती है कि कृपया इसे रोका जाय वर्ना आतंकवाद की तरह ये भी फैलता जायेगा | आज यही हो रहा है हर घर में एक 'तलाकशुदा' है | सबसे ज्यादा बच्चों का नुक्सान हो रहा है वो माता-पिता में से किसी भी एक के प्यार से वंचित रह जाते हैं | यदि आपस में सामंजस्य नहीं बना सकते तो क्या रिश्ता तोड़ देना चाहिए ? उनसे जुड़े और लोग भी तो उससे प्रभावित हो सकते हैं सिर्फ दो लोगों के बीच शादी नहीं होती है सिर्फ पति-पत्नी का रिश्ता नहीं बनता है साथ में और भी बहुत सारे रिश्ते बनते हैं जुड़ते हैं जो तलाक के साथ ही वे सारे भी खत्म हो जाते हैं |                              
                                         हम जितने आधुनिक होते जा रहे हैं हमारे रहन-सहन व विचारों में भी फर्क पड़ता जा रहा है मतलब हम चाहे जैसे रहें जियें कुछ भी सही-गलत करें हमें करते रहना चाहिए ? हमारे सही या गलत से क्या हमारे आस-पास का वातावरण दूषित नहीं होता ? या दूसरों पर प्रभाव नहीं पड़ता ? अच्छी बात कोई जल्दी नहीं अपनाता पर गलत चीजें लोग तुरंत अपना लेते हैं | क्या यही आधुनिकपना है कि एक सदस्य आज विवाह करता है विचार मिलते हैं तो ठीक, नहीं मिले तो तलाक फिर दूसरा विवाह फिर तलाक,फिर विवाह फिर तलाक !! मतलब विवाह और तलाक एक मजाक बन कर रह गया है | कोई भी स्त्री-पुरुष समझौता नहीं करना चाहता कारण कि दोनों ही समर्थ हैं दोनों ही कमाऊं हैं एक दूसरे के बिना किसी का काम नहीं रुकने वाला दोनों ही चला लेंगे अलग-अलग | मेरे ख्याल से तो अलग की नौबत ही नहीं आनी चाहिए जहाँ प्यार है दोनों एक हो चुकें हैं तन से व मन से तो अलग कैसे हो सकते हैं सिवाय कि मौत ही जुदा कर सकती है | दोनों को ही कोशिष करनी चाहिए एक दूसरे के साथ सामंजस्य बिठाने की एवं एक-दूसरे के सम्मान की | चाहे कुछ भी हो जाता अगर ये तलाक का रास्ता ही न बना होता तो शायद कोई मजबूरी में भी यह कदम न उठाता, एक दूसरे को और  ज्यादा समझता, गलतियों को समझता माफ करता जाता तो रिश्तों में और मधुरता आती एवं और भी दृढ रिश्ता होता जाता जितना ज्यादा दोनों साथ रहते,पर अब ये हो ही नहीं सकता क्योंकि एक खुला हुआ रास्ता सामने है हालाँकि गत वर्ष कुछ ठोस नियम व क़ानून बनाये गये हैं रास्ते को थोड़ा कठिन कर दिया गया है लेकिन हर आम आदमी के लिये बंद नहीं किया गया | जहाँ जान-हानि की संभावना हो उनके लिये तो यह मार्ग बिल्कुल सही है वह अपना सम्बन्ध-विच्छेद करा सकते हैं, परन्तु हर छोटी-मोटी बात के लिये, नादानी के लिये एवं ज़रा सी असुविधा के लिये कि जिसे देखो वही तलाक के लिये चला आ रहा है ऐसे इन नादान लोगों के लिये इस रास्ते को बंद करने की जरूरत है इस रास्ते पर चलकर कोई बहुत नेकी नहीं कर रहा है | और भी लोग जंगली होते जा रहें हैं एवं मनमानी करते जा रहे हैं | सबसे ज्यादा तरस उन मासूमों पर आता है जिन्होनें अभी-अभी दुनिया में कदम रक्खा है जब वे मासूम बोलने लायक हुए तो स्कूलों में दोस्तों से कहते हैं " MY PARENTS ARE SEPARATED OR I HAVE SECOND FATHER OR SECOND MOTHER, I AM A CHILD OF DIVORCED PARENTS''......|                                                                                                                  
                                  ये सही नहीं है इसे तत्काल रोका जाना चाहिए | कम से कम माँ-बाप को अपने बच्चों के भविष्य का तो ख्याल रखना चाहिए अपनी ज़िंदगी तो खराब कर ही रहे हैं साथ में उन मासूमों की भी ज़िंदगी की शुरुआत ही बर्बादी के रास्ते पर हो रही है सो कृपया ऐसे लोगों के लिये इस रास्ते को हमेशा-हमेशा के लिये बन्द कर देना चाहिए जब किसी के पास कोई उपाय या ऑप्शन ही नहीं बचेगा तो मजबूरी में उसे वो रिश्ता अपनाना ही पड़ेगा जो सामाजिक एवं पारिवारिक दोनों ही दृष्टियों से उचित है, सम्माननीय है एवं सराहनीय है |              
                                         इस आकांक्षा के साथ कि आने वाला समय बच्चों एवं परिवार में खुशियाँ लाये, बच्चों का भविष्य उनके माता-पिता के आपसी प्यार व सहयोग के संरक्षण में उज्जवल हो एवं स्वस्थ्य समाज का गठन हो |                                                                                                                                                            
                                                                                                           शुभेक्षु.....
                                                                                                                       डा.प्रीति गुप्ता
                                                                                                                           लखनऊ  
            

Wednesday, 19 October 2011

हमारे भारत देश को खतरा है ...........!!!!!

`कहा जाता है कि परिवार समाज का ढाँचा होता है परिवार से समाज बनता है,समाज से देश और देश से दुनिया | हम विश्व-बंधुत्व की बात करते हैं, राष्ट्रीय एकता की बात करते हैं,सामाजिक व्यवस्था की बात करते हैं, पारिवारिक दायित्व, संतुलन और सामंजस्य की बात करते हैं पर हम हैं कहाँ ? सब-कुछ क्या ठीक व सुचारु रूप से चल रहा है ? जहाँ देश व विश्व-एकता के मूल्यों का दर बढ़ा है वहीँ सामाजिक व पारिवारिक एकता के मूल्यों का दर गिरा है | रिश्तों का मूल्य घटता जा रहा है | कहते हैं आवश्यकता आविष्कार की जननी है जहाँ विज्ञान ने सफलता हासिल की है वहीँ खुद मानव की आवश्यकताओं ने मनुष्य को स्वार्थी, निकम्मा, भाव-विहीन और अँधा पशु बना दिया है | आज के इस भागते युग में आम आदमी भी आम नहीं रह गया है, अपनी-अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति में ही दिन व्यतीत करता जा रहा है | अगर कोई पुत्र अपने माता-पिता की देखभाल करता भी है तो वह या तो मजबूरी में या फिर लालच में, बहुत ही खरी बात है पर बिल्कुल सटीक व सही | कोई सहर्ष स्वीकार नहीं करेगा पर यही हकीकत है वह दिल से या खुशी-खुशी अपने माता-पिता की सेवा नहीं करता |
                       आज देश ने तरक्की तो बहुत कर ली है पर उस तरक्की की नींव ही खोखली होती जा रही है | हमारा 'भारत-वर्ष' जहाँ सभ्य समाज की मिसाल माना जाता था आज वो सभ्यता कहाँ है ? जहाँ 'अतिथि देवो भवः' वहाँ अतिथि बोझ बन गया है, अपने-पराये का भेद करना मुश्किल है | जहाँ एक तरफ तो हिन्दू, मुस्लिम से, सिक्ख, ईसाई से अन्तर्जातीय- विवाह कर रहा है, इससे ये तो साबित होता है कि हम विचारों से बहुत ऊपर उठ चुकें हैं, जाति का बंधन नहीं रहा, हम-सब एक ईश्वर की संतान हैं, हम सबका मालिक एक है जातिवाद हट चुका है जो आज से लगभग हमारे अनुभव के अनुसार २०-२५ वर्ष पहले नहीं था | ये बहुत ही अच्छी बात है और बाहरी देशों की तरह हमारा देश भी अब जाति का बंधन नहीं मानता पर क्या एक परिवार में एक ही पिता की चार संतानें एक होकर रह पा रहीं हैं ? नहीं २०-२५ वर्ष पहले ये संभव था, सहज था, आम बात थी | कोई परिवार से अलग होता ही नहीं था | कोई मजबूरी हो,बाहर नौकरी-पेशा हो तो अलग बात थी पर चार भाई अलग होने की सोच ही नहीं सकते थे,ऐसी सोच ही नहीं विकसित थी पर आज के युग में ये ज़रूरत बन चुकी है | कोई किसी के साथ समझौता नहीं करना चाहता, त्याग की भावना तो रह ही नहीं गई | हर आदमी अपने लिए, अपने स्वार्थ के लिए, अपने सुख के लिए केवल जीना चाहता है | ये तो थी एक परिवार की बात, आम आदमी में जब परोपकार व त्याग की भावना रह ही नहीं गई तो फिर उसके अंदर सहन-शक्ति भी कहाँ बच पाई उसके रस्ते में जो भी आ रहा है, या जो उसकी बातें नहीं मान रहा है, तुरंत तमन्चा निकाल कर सामने वाले को मौत के घाट उतार दे रहा है | ये है हमारे देश की स्वतंत्रता जिसके लिये बापू ने अनशन किया था | जिस सुखद भविष्य की इच्छा से बापू ने अहिंसा की राह पर चलकर देश को आज़ादी दिलवाई क्या वो देश सुरक्षित है ? अपने ही घर वालों से ? जो आपस में ही मार-काट कर रहें हैं ? क्रोध, हिंसा व बेइमानी का राज हो गया है ? जिस देश में स्वतंत्रता-सेनानी, स्वतंत्रता-संग्राम में अपनी जान दाँव पर लगा देते थे वहाँ अब 'स्वान्तःसुखाय' का शासन चल रहा है | शायद कुछ ज्यादा ही स्वतंत्रता सबको दे दी गई | हर आदमी के पास हथियार कहाँ से आ जाता है ? वो अपनी सुरक्षा के लिये हथियार रखता है या फिर लोगों में खौफ बाँटने के लिये ? सरकार को चाहिए कि हर आम व्यक्ति के पास
से तमन्चा,औजार,हथियार सब जब्त कर लिये जायें | पहले परिवार की व्यवस्था को सुधारा जाए फिर समाज और फिर देश, तभी हमारी आज़ादी सुरक्षित व कायम रह सकती है वर्ना हम अपने ही परिवार में, समाज में, देश में असुरक्षित हैं | पारिवारिक मूल्यों को, मानवीय मूल्यों को, रिश्तों के मूल्यों को सर्वप्रथम बढ़ावा दिया जाये फिर सब अपने-आप व्यवस्थित होता चला जायेगा, वर्ना आगे की आने वाली जनरेशन में हर बच्चा जन्म लेते ही मार दिया जायेगा या फिर वो बड़ा होकर अपने स्वार्थ के लिये अपने ही परिवार का खात्मा कर डालेगा | हमारे 'भारत-वर्ष' को बाहरी देशों से कम, आन्तरिक लोगों से ज्यादा खतरा है |

      ''ऐ मेंरे वतन के लोगों,ज़रा आँख में भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो कुर्बानी''
                                                                                                                                                                                                                                                                                       
 डा. प्रीति गुप्ता
लखनऊ                                                                                                                                                

Saturday, 8 October 2011

"मनैया "

                                        मनैया जो ठाकुरगंज गाँव के पुरोहित की इकलौती बेटी है ,जहाँ-जहाँ उसके बाबा कथा बाँचने जिस भी घर जाते ,साथ में मनैया भी उछलती -कूदती जाती | अभी वो १० साल की ही है | बाबा के साथ-साथ अब उसे भी पोथी पढ़नी आ गई है | स्कूल तो कभी वो गई ही नहीं पर फिर भी उसे अक्षरों का पूरा ज्ञान है |
                                    गाँव के सभी लोग उसे प्यार से 'छोटी पंडितानी ' कहते और वह ये सम्मान भरा नाम सुनकर खुशी से गद्गद हो जाती | 'छोटी पंडितानी ' में उसे अपना आदर नज़र आता था ,क्योंकि उसे मनैया नाम ज्यादा अच्छा नहीं लगता | जब उसने अपने बाबा से पूछा कि बाबा आपकी पोथी में कहानियों में इतने अच्छे -अच्छे नाम हैं फिर भी मेरा नाम आपने मनैया क्यों रख दिया ? इस नाम का कोई मतलब ही नहीं मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगता , तब उसके बाबा ने बताया कि बिटिया तू बड़ी भाग्यवान है हमारी कोई संतान नहीं हो रही थी दूर गाँव में एक देवी जी का पवित्र स्थान है जिसे " मन्नत-मैया '' के नाम से जाना जाता है | हम और तुम्हारी माई 
हमदोनों को किसी ने बताया कि " मन्नत-मैया " से जाकर मन्नत माँगो वो अवश्य पूरी करेंगीं अगर तुम्हारा मन सच्चा है और वाकई में तुम सच्चे दिल से संतान की कामना रखते हो तो तुम्हारी मन्नत खाली नहीं जायेगी | बस फिर क्या तुम्हारी माई के बार-बार आग्रह करने पर हमलोग चले गये  " मन्नत-मैया " के स्थल पर और निर्जल रहकर पूरी एक रात और एक दिन हमदोनों ने वहाँ पूजा-अर्चना की ,मन्नत माँगी और फिर वापस आ गये | ठीक नौं महीने बाद " मन्नत-मैया " ने तुम्हे हमारी गोद में दे दिया और उन्हीं  " मन्नत-मैया " के नाम पर हमने तुम्हारा नामकरण भी कर दिया इसी वजह से तुम्हारा नाम  ' मनैया ' पड़ गया |
                           इतना सब कुछ सुनने के बाद मनैया को अपने नाम से बेहद प्यार हो गया जिसमे माई एवं बाबा का इतना दुलार भरा था | मनैया बहुत ही भोली एवं भली लड़की थी | चंचल एवं हँसमुख साधारण से परिवार में जन्मी बिना स्कूली शिक्षा के ही पूरी तरह शिक्षित थी | समय रहते मनैया की माई ने मनैया को सारे घरेलू हुनर सिखा रख्खा था अँगीठी - फूँकना,   आटा-गूंथना , कुँए  से पानी भर के लाना , आँगन-लीपना , गाय को चारा -पानी देना , कभी-कभी तो जब मनैया के बाबा घर पर नहीं होते तो मनैया खुद ही दूध भी दुह लेती थी | मनैया से उसकी माई और बाबा दोनों ही प्रसन्न रहते उसके बाबा तो उसे साक्षात्  " मन्नत-मैया " समझते, उसका दोनों पैर छूते , बहुत दुलार करते थे |    
                                    समय बीतते देरी थोड़ी न लगती है वह भोली-भाली १० साल की मनैया अब लगभग उन्नीस साल की हो चुकी थी | माई और पुरोहित बाबा को अब मनैया के हाथ पीले करने की चिंता सताने लगी | मनैया से जब भी उसकी माई ब्याह के बारे में बात करतीं तो वह बिलकुल उदास हो जाती , उसे अपने बाबा और माई को छोड़कर कहीं जाने की बात ही खटकने लगती वह रुआँसी होकर 'काली' ( उसकी गाय ) के पास जाकर बैठ जाती और उससे मन ही मन ढेरों सवाल करती और ये भी कहती कि 'काली' अगर मुझे मजबूरन जाना ही पड़ा तो तू मेरी बूढ़ी माई और बाबा का ख्याल रखना | 'काली' पुरोहित की पुरानी गाय से जन्मी बछिया थी बिलकुल काली जिस वजह से उसका नाम ही काली पड़ गया और मनैया एवं काली लगभग साथ ही साथ बड़ी हुईं | मनैया को काली से बेहद लगाव था | माई तो कहतीं कि चल जब तू विदा होकर जायेगी तो तेरे साथ ही तेरी काली को भी विदा कर देंगें और हुआ भी वही | गाँव के जमींदार साहब का इकलौता पुत्र 'नंदन' बड़ा  ही होनहार लड़का था वह पढ़-लिखकर बैरिस्टर बाबू  बन चूका था | उसकी माँ बचपन में ही चल बसीं थीं | दादी ने बड़े लाड़ व प्यार से पाला था | जमींदार साहब ने अपने बेटे के प्यार में दूसरी शादी भी नहीं की | जमींदार साहब ने खुद ब खुद ही पुरोहित से बात की | मनैया को वो बचपन से जानते हैं सो उन्होंनें अपने मन की बात पुरोहित से कर दी | पहले तो पुरोहित चौंके कि इतने बड़े जमींदार और कहाँ हम पुजारी , कथा बाँचकर गृहस्थी चलाते हैं हम कैसे अपनी कन्या इन्हें सौंप पायेंगे ? ये इतने बड़े आदमी और हमारे पास सिर्फ मनैया एवं काली के और कोई लक्ष्मी नहीं जो हम इन्हें दान दें पायें | जमींदार साहब बड़े दिलवाले थे उनहोंने कहा कि आप के पास लक्ष्मी नहीं तो क्या हुआ सरस्वती तो है आपकी सरस्वती हमारी लक्ष्मी हुई | यह सुनकर पुरोहित के आँख से आँसुओं की धारा बह निकली उनहोंने तुरंत जमींदार का पैर पकड़ लिया और कहा कि मैं बहुत ही भाग्यवान हूँ और उससे भी भाग्यवान मेंरी बिटिया जो आप जैसे नेक इंसान के घर जा रही है | जमींदार साहब ने पुरोहित को उठाकर गले से लगा लिया ये कहते हुए कि पंडित होकर मेंरे पैरों में मत पड़ो पुरोहित मुझे पाप चढेगा |
                         शुभ-लगन में नंदन से मनैया का ब्याह बड़े धूमधाम से हो गया और जैसा कि मनैया की माई ने कहा था कि काली को भी मनैया के साथ विदा कर देंगें सो काली भी मनैया के साथ विदा हो गई | जमींदार के यहाँ नंदन की दादी ने मनैया की आवाभगत की , बड़े प्यार व सम्मान के साथ अपने घर ले आईं | मनैया को तो एक और बाबा मिल गये थे जो पुरोहित से भी ज्यादा ध्यान रखते मनैया का एवं दादी भी मनैया से बहुत लाड़ करतीं थीं | मनैया ने अपने कुशल व्यहार से सबके मन में अपने लिए विशेष जगह बना ली थी | नंदन जो पहले इतना उदास सा रहता था किसी से बात-चीत नहीं करता था,  माँ के न होने का दर्द जो उसने सहा है इसी वजह से वह ज्यादा खुशमिजाज व हँसी-मजाक नहीं करता था | पर विवाह के बाद वह धीरे-धीरे परिवर्तित होने लगा | उसका स्वभाव मधुर हो गया उसे लोगों से मिलना-जुलना बातचीत करना अच्छा लगने लगा | अब उसे घर में रौनक दिखने लगी | मनैया सबका ख्याल रखती थी | बीच-बीच में अपनी माई व बाबा से मिल आती  उनका भी ध्यान रखती व अपने ससुराल का भी ध्यान रखती बड़ा अच्छा तारतम्य बिठा रखी थी दोनों घरों के बीच एवं हर रिश्ते की मजबूती को बाँधे रखी थी |
                                      विवाह हुए लगभग एक वर्ष हो गया बैरिस्टर नंदन को केस के सिलसिले में अक्सर शहर जाना पड़ता था | कभी-कभी तो वह रात तक घर पहुँच जाते थे पर अक्सर  उन्हें शहर में केस खत्म न होने की वजह से रुक जाना पड़ता था इधर मनैया इंतज़ार करती और जब नंदन बाबू आ जाते तो झट हाथ मुह धुलाकर पहले पति को खाना खिलाती फिर खुद खाती | इसी बीच नंदन की बुआ अपने बेटे शिवम के साथ गाँव आ गईं कुछ दिन रहने एवं शिवम के लिए गाँव के ही एक रिश्तेदार  के यहाँ लड़की देखने | हालाँकि बुआ तो शहर में रहती थीं | शिवम के साथ उसकी छोटी  बहन  भी आई थी  पायल वो अभी १० साल की थी | उसकी छुट्टियाँ शुरू हुई थीं तो वो लोग आ गये चूँकि नंदन के विवाह पर नहीं आ पाये थे | दादी से मनैया की बहुत तारीफ़ सुन रखी थीं इसीलिए भी उनको बहू को देखने  तो आना ही था | मनैया की तारीफें सुनकर ही तो वो भी राजी हो गईं कि शिवम की भी शादी गाँव की ही लड़की से करेंगे क्यूंकि शहर की लड़कियाँ बड़ी मॉडर्न होती हैं | बुआ को मनैया बहुत पसंद आई , पायल भी मनैया भाभी से जल्दी ही घुल मिल गई पर शिवम थोड़ा धीरे -धीरे घुला-मिला  चूँकि वह बड़ा था ,मनैया का पद तो बड़ा था पर उमर में वह शिवम से भी छोटी थी | बैरिस्टर बाबू भी १० साल बड़े थे मनैया से | नंदन को फिर शहर जाना पड़ा | अबकी बोलकर गया था कि दो-चार दिन लग जायेंगे इस लिए इंतज़ार मत करना | बल्कि बुआ नंदन को टोकी भी थीं कि इतनी कच्ची उम्र की बहू को ज़्यादा दिन के लिए अकेली न छोड़ा करो बिचारी घबड़ा जायेगी | नंदन ने कहा बुआ मैं इसी कोशिश में लगा हूँ कि मेरा काम हो जाय तो मैं भी शहर में ही मनैया के साथ ही रुकने का बंदोबस्त कर लूँ कि बार-बार आना-जाना न पड़े पर दादी व बाबूजी की देखभाल भी तो ज़रुरी है | बुआ क्या बोलतीं सही तो कह रहा था नंदन | मनैया सर पर आँचल डाले पर्दे की आड़ में खड़ी सब सुन रही थी और अश्रु भरे आँखों से नंदन को जाते हुए देख रही थी | नंदन के जाने के बाद पायल ने मनैया भाभी का खूब दिल बहलाया , गाना सुनाया ,अपना नृत्य दिखाया , भाभी भी उसके साथ नृत्य करने लगी अचानक बीच में शिवम आ गया , मनैया सकुचाते हुए किनारे बैठ गई | शिवम ने कुछ कहा नहीं चुपचाप चला गया | फिर मनैया व पायल नाचने , गाने लगीं | इसी बहाने मनैया नंदन की याद को भूल गई थोड़ी देर के लिए | नंदन की बुआ , पायल , शिवम एवं दादी शिवम के लिए लड़की देखने उनके रिश्तेदार के यहाँ चले गये | सबको लड़की पसंद आ गई शिवम से पूछा तो कुछ खास नहीं महत्व दिया कहा अगर सभी को पसंद है तो मुझे भी पसंद है और लड़के वालों की तरफ से हाँ हो गयी | मनैया की माई और पुरोहित बाबा भी आये नंदन की बुआ से मिलने | शिवम के पापा तो नहीं आ सके थे शहर में उन्हें काम बहुत था ऑफिस का | सो दादी व बुआ ने रिश्ता तय कर दिया | दादी बहुत खुश थीं कि नाती की बहू भी उनके पसंद की आ रही है | शिवम को शहर जाना था जल्दी क्योंकि काम का नुक्सान हो रहा था | उसने अपनी माँ से कहा अब चलो घर , तो पायल ने कहा भईया  मैं अभी नानी के यहाँ और रुकना चाहती हूँ, मुझे मनैया भाभी के साथ बहुत अच्छा लगता है | शिवम ने तुरंत मनैया को देखा अचानक दोनों की नज़रें मिल गईं मनैया झेंप गई , तब शिवम ने कहा ठीक है पायल तुम यहीं रहो जब तुम्हारी छुट्टियाँ समाप्त हो जायेंगीं तब मैं फिर तुम्हे लेने आ जाउंगा | पायल खुश हो गई और मनैया भी खुश हो गई | शिवम माँ के साथ शहर चला गया | पायल भी खेलते-खेलते थक कर सो गई , फिर मनैया रोज की तरह बाबू जी को दूध का गिलास दिया और दादी के पास जाकर उनका पैर दबाया , जब दादी सो गईं तब मनैया भी अपने कमरे में आकर सो गई |
                                    मनैया के घर से खबर आया कि पुरोहित जी को खाँसी का दौरा पड़ा है , तुम्हे तुरंत घर बुलाया है | जमींदार साहब ने तुरंत अपनी बग्घी निकलवाई और मनैया को भेज दिया | जब-तक मनैया घर पहुँची तब-तक पुरोहित जी चल बसे...मनैया बहुत रोई ,बहुत दुखी हुई | माई के गले से चिपटकर रोती रही , सब गाँव वालों ने आकर 'क्रिया-करम ' किया जमींदार साहब भी आये थे | नंदन बाबू का कुछ पता ही नहीं चला  खबर भेजा , पर कोई जवाब ही नहीं आया | मनैया बहुत टूट गई थी | अपने-आपको बहुत ही असहाय और निराधार समझ रही थी | जी-जान से जिसको प्यार करती थी वो बाबा उसे छोड़कर चल बसे ...माई अकेली हो गई | माई का दुःख मनैया से सहा नहीं जा रहा था ऐसे में वो माई को क्या बताये कि नंदन बाबू का कुछ पता नहीं चल रहा है , क्या करे , फिर उसे जमींदार साहब के साथ  ससुराल लौटना पड़ा , पायल व दादी अकेली जो थीं | दुसरे ही दिन शिवम भी आ गया पायल को लिवा जाने के लिए ,पायल चौंक गई कि इतनी जल्दी कैसे आ गये | शिवम को मनैया के बाबा के बारे में पता लगा और ये भी पता लगा कि नंदन का कुछ अता-पता नहीं है , तो उसे मनैया से थोड़ी सहानुभूति सी हो गई और मनैया का दुःख वो समझने लगा | उसने मनैया से कहा आप परेशान मत होइये नंदन भैया जल्दी ही आ जायेंगे | हम भी जाकर शहर में पता लगाएंगे | इतना सुनकर मनैया को थोड़ी बहुत तसल्ली हो गई | दुसरे दिन शिवम पायल को लेकर चला गया |
                                      धीरे-धीरे एक महीना होने को आ गया और नंदन का कुछ पता  ही नहीं मनैया तो बेहाल सी हो गई नंदन से उसका अटूट रिश्ता जो था | वो बहुत प्यार करती थी अपने पति को , उनके कपड़ों को महकती ,उनकी तस्वीर निहारती , खोई-बिखरी रहती | अपने सारे अच्छे रंग-बिरंगे कपड़े व गहनें उतार कर रख दी कि जब नंदन आयेंगे तभी पहनेंगे | जिन-जिन कपड़ों में नंदन ने उसकी तारीफ़ की थी कि तुम बहुत अच्छी लगती हो इन कपड़ों में उन-उन कपड़ों को उसने सहेज कर रख रखा था कि नंदन के आने पर पहनेगी पर एक महीना हो गया नंदन नहीं आये | मनैया अब पहले वाली मनैया नहीं , बिलकुल उदास-उदास सी रहने लगी | दादी एवं जमींदार बाबू करें तो क्या करें उनसे भी मनैया का दुःख देखा नहीं जाता और बेटे की चिंता अलग सताती कि क्या बात है कोई खबर क्यों नहीं किया नंदन ने  कहीं किसी परेशानी में तो नहीं ? शिवम फिर आया दो दिन बाद कि नंदन भैया का कोई पता नहीं लग पा रहा है  मनैया बिल्कुल ही निराश हो गई और फूट-फूट कर रोने लगी दादी अपने कमरे में सो रहीं थीं और जमींदार बाबू घर पर नहीं थे ,इधर-उधर कुछ अपने बेटे के बारे में पता ही करने गये थे | मनैया का इस तरह से फूट-फूट कर रोना शिवम के दिल पर हथौड़े की तरह लग रहा था उससे सहन नही हो रहा था मनैया का ये दर्द , वो क्या करे, कैसे भाभी का दिल बहलाए, कैसे खुश रखे, उसके दिमाग ने जो कहा वो किया | उसने अचानक मनैया को खींचकर सीने से लगा लिया , मनैया तो बेसुध सी थी , रोती ही जा रही थी ,उसे ये भी होश नहीं कि ,उसे शिवम ने सीने से लगा रखा है या नंदन ने वो बदहवास सी रो रही थी | शिवम उसे उसके कमरे में ले गया और अचानक मनैया के साथ वो सब कुछ कर डाला जो उसे नहीं करना चाहिए था | मनैया छुड़ाती रही अपने-आपको बहुत बचाने की कोशिष पर नाकामयाब रही ....| शिवम के मन में ये सब कुछ पहले से था या अचानक हुआ | क्या वो मनैया से धीरे-धीरे प्यार करने लगा था या उसके मन में सिर्फ वासना जाग उठी थी थोड़ी देर के लिए ? मनैया क्या करती .....| दुसरे दिन शिवम बिना किसी से कुछ कहे शहर चला गया | मनैया ने निश्चय किया कि अब ज़िंदगी भर शिवम का मुह नही देखेगी और वह अपना एक और दर्द किसके साथ बांटे ? बूढ़ी दादी , जो पहले ही नंदन के ग़म में बीमार हुई जा रही हैं , या फिर अपनी बेहाल माई  से , जो बाबा के जाने के ग़म में डूबी हुईं हैं , उनलोगों को और दर्द कैसे दें ? रहे जमींदार बाबू , तो उनसे कहने की हिम्मत कहाँ से जुटाये ? इतनी बड़ी बात , वो भी इतनी शर्मनाक ? वो करे तो क्या करे ? नंदन आ जाता तो वो सबकुछ उसे बता देती , एक वही तो था , जिससे वो सबकुछ बता सकती थी , एकसाथ तीन-तीन दर्द और अब कैसे सहे ? शहर से नंदन की बुआ भी लौटकर नहीं आईं , न पायल आई हाल-चाल लेने ? बाद में पता चला कि शिवम ने शादी करने से मना कर दिया और वो रिश्ता जो पक्का हुआ था , टूट गया | मनैया माई से मिलने तो जाती , पर कुछ कहती नहीं , थोड़ी देर वहाँ रुककर फिर ससुराल आ जाती | उधर मनैया के पति को गये हुए डेढ़ महीने हो गये और इधर मनैया को पता चला कि वो डेढ़ माह के गर्भ से है | एक खुशी की लहर सी दौड़ आई , मनैया की ज़िंदगी में जीने का एक रास्ता तो मिला नंदन न सही उसकी निशानी तो सही जिसके सहारे वो जी लेगी |
                                           छः महीने बाद अचानक नंदन लौटा घर , बढ़ी हुई दाढी , मूंछे और लंबे-लंबे बाल , एक गंदी सी कमीज व पतलून डाले हुए काफी दुबला भी हो गया था | मनैया तो उसे देखकर पहचान ही नहीं पाई , नंदन भी खामोश घर के अंदर पाँव रखा | जमींदार साहब तो जैसे रो पड़े और नंदन को गले से लगाते हुए कहा कि मैं तो समझा था कि तुम अब इस दुनिया में ...' ऐसा मत बोलिए बाबूजी आपके हाथ जोड़ती हूँ '....   रूँधे  गले से बीच में ही मनैया बोल पड़ी | दादी भी चलने-फिरने में असमर्थ जब कमरे में ये सब आवाजें सुनीं  तो  दीवाल का सहारा लेते हुए बाहर आँगन तक आ ही गईं | कहने लगीं हमारी साँसें इसीलिए रुकी थीं कि जबतक नंदन नहीं आता हम कैसे जाते ,बिना नंदन से मिले ? हम जानते थे कि हमारे जिगर का टुकड़ा सही सलामत है ,एक न एक दिन वापस जरूर आएगा| फिर बाबू जी खुद ही छड़ी उठाकर गये नाई को बुलाकर लाये, उसने तुरंत वहीं आँगन में नंदन की दाढी साफ़ की बाल छोटे किये | नंदन नहा-धोकर साफ़ हो गया | मनैया खाना लगा दी खाने के बाद नंदन ने बताया कि बाबू जी मैं बहुत बुरा फँस गया था , एक केस के सिलसिले में न  जाने मुझसे कैसे-कहाँ  गलती हो गई और मुझे छह महीने हवालात में काटनी पड़ी , मेंरी किसी ने नहीं सूनी | वहाँ सिर्फ पैसा बोलता है , झूठ बिकता है ,झूठ खरीदा जाता है और पैसा ही शहर-वासियों का ईमान-धरम सब-कुछ है ,पैसा ही भगवान है | दादी बीच में ही बोल पड़ीं बेटा अब तू सबकुछ भूल जा , नए सिरे से ज़िंदगी शुरू कर , अब तेरे घर भी नन्हा-मेहमान आने वाला है | ये सब मनैया के पुण्यों का फल है , जो तू आज सही-सलामत अपने घर लौट आया |
                                           मनैया अब पति के पास जाये भी तो कैसे ...दिल पर जो इतना बड़ा बोझ है | एक तरफ नंदन के आने की खुशी तो दूसरी तरफ बीते ज़िंदगी में उसके साथ जो घटनाएं घटीं , उसका दुःख क्या-क्या नंदन को बताए , बाबा का ग़म , नंदन के न आने की पीड़ा और अपने साथ हुए बलात्कार की व्यथा , कैसे सबकुछ एकसाथ बता दे , नंदन तो खुद ही इतनी परेशानियाँ उठाने के बाद यहाँ वापस आ पाया है | जब वह धीरे-धीरे अपने दुःख से उबर जायेगा तब उसे बता देंगें ,इन्ही सब उधेड़बुन में मनैया थी , तबतक नंदन ने पीछे से कंधे पर हाथ रखते हुए कहा , क्या बात है , कहाँ खो गई , कुछ बताओगी नहीं अपने बारे में , कैसे रही , क्या-क्या सोचती रही मेंरे बारे में और ये छोटे मेहमान ...इनके बारे में तो कोई अंदाज़ा ही नहीं था | बड़ी खुशी हो रही है घर लौटकर....खुशियाँ मेंरा इंतज़ार कर रहीं थीं | मनैया कुछ न बोल सकी ,उसकी आँखों से आँसूं निकल पड़ा | धीरे-धीरे नौ महीनें निकल गये , मनैया को एक प्यारा सा बेटा हुआ | मनैया की माई भी आई कहने लगीं कि आज तुम्हारे बाबा ज़िंदा होते तो कितने खुश होते नाना बनकर ....और सबकी आँखों से आँसूं छलछला पड़े | फिर दादी ने बात संभाली ये कहके कि कोई बात नहीं मनैया की माँ तुम तो ' नानी ' बन गई न चलो लड्डू खिलाओ फिर सब हँसी-खुशी में वातावरण बदल गया | जमींदार साहब पोते को पाकर बहुत खुश और दादी पर पोते को पाकर बहुत खुश हुईं | नंदन ने पूछा दादी बुआ क्यों नहीं आईं ? तो दादी ने कहा , कहलवाया तो था पर न जाने क्यों वहाँ से कोई नहीं आया | तुम्हारे न रहने पर शिवम जरूर एक- दो बार आया था | शिवम का नाम सुनते ही मनैया थर-थर काँपने लगी और फिर नंदन से नज़र नहीं मिला पा रही थी | सारा पिछला बीता हुआ दृश्य उसको याद आ गया उसके रोंगटे खड़े हो गये , सबके जाने के बाद नंदन ने उससे पूछा क्या बात है मनैया , तुम्हारी तबियत तो ठीक है न मनैया , क्यूँ परेशान लग रही हो ? तब मनैया ने थोड़ी हिम्मत बनाई और कहा , मैं आपसे कुछ बात करना चाहती हूँ| जब आप आये थे तब आप स्वस्थ नहीं थे और अब सब ठीक हो रहा है , मेंरे दिल पर बहुत बड़ा बोझ है जो मैं सिर्फ आपसे ही कह सकती हूँ ..तब -तक बीच में काली की आवाज़ आई ..बाँ ...आ... आ.. आ.. आ...  बाँ.... अ ..आ...आ.... | मनैया उठकर काली के पास गई उसको सहलाई पानी दिया दस - पाँच मिनट उसके पास बैठकर वापस चली आई | जब मनैया के साथ कोई नहीं था तब मनैया काली से ही तो अपने मन की बातें करती थी सिर्फ काली जानती थी कि मनैया बेगुनाह है और वो ये  भी जानती थी कि मनैया की बेगुनाही साबित नहीं हो पायेगी क्योंकि ये लोग ठहरे ज़मींदार शायद इसीलिए काली बीच में चीख पड़ी वो बेजुबान अगर बोल सकती तो बोल कर यह बात मनैया को अपने पति से बताने के लिए मना कर देती पर वह बाँ - बाँ करने के अलावा कुछ कर नहीं सकती |            
                                       मनैया ने माहौल देखा और पति का प्यार पाकर उस वाकये को उसने नन्दन से बता दिया और फूट-फूट कर रो पड़ी | नन्दन की त्यौरियाँ चढ़ गईं उसने कहा तुमने इतने दिनों से इस बातको  छिपाये रखा दादी से, बाबूजी से किसी से नहीं बताया क्यों ? तुम्हे तो डूब कर मर जाना चाहिये इतना बड़ा कलंक माथे पर लगाये जिन्दा कैसे  हो ?  मनैया को काटो तो खून नहीं ये  क्या हो गया नन्दन को अभी तो अच्छा-खासा था और मेरे साथ सहानुभूति रखने के बजाय मुझको भला-बुरा कह रहा है , वह अपने-आप पर और अपने बच्चे पर तरस खाकर रोने लगी | नन्दन कमरे से बाहर निकल गया और सीधा बाबूजी के कमरे में गया | सुबह होते-होते दादी को भी सारी बातें पता लग गईं और बाहर आँगन में बैठ कर बड़बड़ानें लगीं कि तभी शिवम बार-बार आने लगा था और इसकी वजह से उसने भी यहाँ आना छोड़ दिया मेरे शिवम पर इल्जाम लगा रही है , तभी क्यों नहीं कहा ? जमींदार साहब ने कुछ नहीं कहा , अपने कमरे में चले गये| न जाने नन्दन से क्या बात-चीत हुई , नन्दन मनैया को और उसके बच्चे को बिना कुछ कहे-सुने उसके मायके ले जाकर उसकी माई के पास छोड़ दिया अंतिम शब्द यही बोला  'यह बच्चा मेंरा नहीं है ' मनैया के तो जैसे होशहवास उड़ गये वह निस्तब्ध सी खड़ी रोते हुए बच्चे को लेकर नन्दन को जाते हुए आखिरी बार देख रही थी.....बच्चे के रोने की आवाज सुनकर मनैया की माई बाहर आई और अचानक मनैया और उसके बच्चे को देखकर अवाक सी रह गई कि क्या हुआ सब-कुछ ठीक तो है न मनैया कुछ न बोल सकी सिवाय इतना कि 'एक पिता ने अपने बच्चे को अपनाने से इन्कार कर दिया ' माई ये बच्चा बिन बाप का हो गया | माई तो सर पकड़ कर बैठ गई , अगल-बगल वाले सब तमाशा देख रहे थे| मनैया निर्दोष होते हुए भी सजा की हक़दार बनी और उसका बच्चा बड़ों की गलतियों का शिकार हो गया | निर्दोष बच्चे का क्या कसूर , समाज तो उसे पाप समझेगा.....मनैया ने सच बताया जिसकी सजा उसे मिल गई ,यदि कुछ न बताती तो कुछ भी न बिगड़ता पर उसके दिल पर बोझ रहता वो अपने पति से सच्चा प्यार जो करती थी इसी वजह से बता दी पर पति ......?? पति ने तो छह महीना कहाँ काटा , कैसे बिताया... ?  मनैया ने  नहीं पूछा जो भी पति ने बताया ,सही या गलत ,मनैया ने तो स्वीकार कर लिया पर पति क्यों नहीं स्वीकार कर पाया ? क्योंकि वह पुरुष है ?  वही दादी जो रातदिन मनैया की तारीफ़ करती थीं , जब बात अपने खून पर आई तो अपने खून को माफ कर दिया ,और दुसरे के खून को झुटला दिया ....?  नन्दन ने सजा शिवम को न देकर मनैया को दे डाला व अपने ही बेटे को.....? इतना बड़ा स्वाभिमानी ?  जमींदार साहब सरस्वती को लक्ष्मी बनाकर ले गये थे और अब न वो लक्ष्मी रही न सरस्वती ?  कलंकिनी बन चुकी है ,किसने उसे कलंकिनी बनाया ? अगर मनैया चुप रह जाती तो आज उसे लक्ष्मी का , देवी का सम्मान मिलता पर सच्चे प्यार में धोखा खाकर वो, बाताकर अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार ली , औंधे-मुह गिर पड़ी ....
                                                    आज उसे गाँव में कोई भी छोटी पंडितानी नहीं कहता बल्कि ये कहता कि अच्छा हुआ ये सब देखने से पहले ही पुरोहित जी चल बसे | मनैया गाय का दूध बेचकर अपने बच्चे को पाल रही है | दूसरे दिन काली भी रस्सी तुडाकर वापस मनैया के गाँव आ गई , मनैया उसका गर्दन पकड़कर खूब रोई कहने लगी काली तुमने मुझे रोका था पर मैं ही पति के प्यार में पागल समझ नहीं पाई | मनैया की माई को अब आँख से ठीक दिखाई नहीं देता रो-रो कर उनकी आँखें चली गईं | इतने मन्नत से जिस बची को माँगा था उसके जीवन में इतना दर्द ? इतनी बड़ी सजा क्यूँ ? मनैया भी  चारपाई पर लेटे अपने बच्चे के साथ आसमान में सिर गड़ाए सोच रही है कि आखिर 'मन्नत-मैया' ने मुझे भेजा ही क्यूँ ? फिर मेंरे बाबा को .....और अब मुझे ......, इस हालत में देखकर क्या  'मन्नत-मैया' बहुत खुश हो रही होंगीं ? क्या पिछले जन्म के पापों का परिणाम है ? इन्ही सब सवालों के घेरे में पड़े हुए सोचते-सोचते कब मनैया की आँख लग गई पता ही नही चला ..............!


--------------------------------------समाप्त ----------------------------------------
                                                                                


उत्तर-प्रदेश हिंदी संस्थान ,लाखनऊ  द्वारा  प्रकाशित 
समस्त  भारतीय भाषाओँ की प्रतिनिधि  पत्रिका 
'साहित्य  भारती ' 
त्रैमासिक 
जनवरी -मार्च , २०१० 
में यह कहानी प्रकाशित हो  चुकी है  
प्रतिक्रियाएं निरंतर प्राप्त हो रहीं हैं ...

हमें विश्वास है आप सब भी  यह कहानी पढ़ने के बाद 
अपनी  राय अवश्य देंगें 
धन्यवाद 
डा प्रीति गुप्ता  

  

Tuesday, 4 October 2011

कुछ कहना है .....

एक कहानी सी उपज रही है मालूम नहीं उसमे कितने पात्र हैं क्या शुरुआत है क्या कहानी है क्या अंत है पर फिरभी एक कहानी जैसा मन हो रहा है |अंदर ही अंदर कुछ चल रहा है | बड़ा ही मार्मिक एवं कारुणिक सा कुछ ...
अजीब से चित्र अजीब से किरदार मेरे साथ-साथ हैं | चलते -बैठते-उठते बात करते ,कुछ काम करते विचारों में मंत्रणा चल रही है वो सब पात्र मेरे अगल ही बगल जैसे महसूस हो रहे हैं | मेरे अंदर ही या तो जी रहे हैं या छटपटा रहे हैं वो भी शायद कविताओं की तरह बाहर आना चाहते हैं अंदर की गहराई से बहुत आवाजें आ रही हैं जो मुझे एकांत में कुछ कहानीनुमा लिखने को व्याकुल कर रहीं हैं | इस भागते हुए समय में घर-गृहस्थी बच्चे जिम्मेदारियाँ ,इसी सब में वक्त बीत जाता है एकांत कहाँ मिलता है और दिल की गहराई को छूने के लिए एकांत की गहराई का भी होना उतना ही आवश्यक है | जितनी गहरी बात है ,वो एकांतिक माहौल उस बात को और भी मर्मस्पर्शी बना देता है |
          मेरे लिए वो एकांत रात्रि का मध्यकाल होता है जब चारों ओर सन्नाटा हो ,सारी दुनिया सो रही हो ,सिर्फ झिंगुरों की आवाजें कानों में पड़ रहीं हों तभी मेरा रचनाकाल होता है उस समय कोई अजीब सी शक्ति मुझसे कुछ लिखवा लेती है वो अदृश्य चेतना कहाँ से आती है मस्तिष्क को शब्दों की दुनिया में ले जाकर भावों के साथ पिरो देती है और लेखनी चल पड़ती है | जो भी लिखा है अबतक ,लिखने के लिए नहीं लिखा वरन महसूस होता है उस अनुभव को किसी से भी कहा नहीं जा सकता जो दिल से निकलकर सीधा कागज पर ठहर जाती है | बस यही मेरी विधा है या वो कविता बन जाती , छंद बन जाती ,या गीत | कभी हमने उन्हें तोड़ा-मरोड़ा नहीं जैसी मन में आती हैं वैसी ही आप सभी के सामने पहुंचतीं हैं कोई भी बाहरी ,बनावटी साज-श्रृंगार नहीं करतीं |
                                               आशा है आप सभी को शब्दों की सादगी एवं सरलता पसंद आएगी |
                      जब ह्रदय काव्य गढ़ता है ,तब कोई दूसरा कविहृदय ही इसे समझ सकता है ,ऐसी मेरी मान्यता है |